मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

ऊचतुर्मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् । 
शोकाभिभूतं राजानं बोधयन्तौ सदुक्तिभिः ॥ १ ॥
कोऽयं स्यात् तव राजेन्द्र भवान् यमनुशोचति । 
त्वं चास्य कतमः सृष्टौ पुरेदानीमतः परम् ॥ २ ॥
यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन वालुकाः । 
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः ॥ ३ ॥
यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च । 
एवं भूतेषु भूतानि चोदितान् ईशमायया ॥ ४ ॥
वयं च त्वं च ये चेमे तुल्यकालाश्चराचराः । 
जन्ममृत्योर्यथा पश्चात् प्राङ्‌नैवमधुनापि भोः ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! राजा चित्रकेतु शोकग्रस्त होकर मुर्देके समान अपने मृत पुत्रके पास ही पड़े हुए थे। अब महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद उन्हें सुन्दर-सुन्दर उक्तियोंसे समझाने लगे ॥ १ ॥ उन्होंने कहा—राजेन्द्र ! जिसके लिये तुम इतना शोक कर रहे हो, वह बालक इस जन्म और पहलेके जन्मोंमें तुम्हारा कौन था ? उसके तुम कौन थे ? और अगले जन्मोंमें भी उसके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध रहेगा ? ॥ २ ॥ जैसे जलके वेगसे बालूके कण एक-दूसरेसे जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहमें प्राणियोंका भी मिलन और बिछोह होता रहता है ॥ ३ ॥ राजन् ! जैसे कुछ बीजोंसे दूसरे बीज उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही भगवान्‌की मायासे प्रेरित होकर प्राणियोंसे अन्य प्राणी उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं ॥ ४ ॥ राजन् ! हम, तुम और हमलोगोंके साथ इस जगत् में जितने भी चराचर प्राणी वर्तमान हैं—वे सब अपने जन्मके पहले नहीं थे और मृत्युके पश्चात् नहीं रहेंगे। इससे सिद्ध है कि इस समय भी उनका अस्तित्व नहीं है। क्योंकि सत्य वस्तु तो सब समय एक-सी रहती है ॥ ५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐🥀💐ॐश्रीपरमात्मने नमः
    कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि: !!
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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