शनिवार, 16 दिसंबर 2017

श्रीराम जी के प्रति भरत जी की अविचल भक्ति



जय सियाराम जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम

श्रीराम जी के प्रति भरत जी की अविचल भक्ति

रामचरितमानस की सम्पूर्ण कथा का पर्यवसान श्रीराम के चरणों में अविचल भक्ति के रूप में होता है | भरत जी अपने आतंरिक हृदय की अभिलाषा को व्यक्त करते हुए कहते हैं :--

“ अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम-जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ “
भरत, भगवान् श्रीराम से एक ही वरदान की याचना करते हैं –हे भगवान् ! मुझे आपके चरणों की भक्ति के अलावा संसार में और कुछ भी नहीं चाहिए | अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—नाम के चार पदार्थों में मेरी कोई आसक्ति नहीं है | मुझे इनकी कतई आवश्यकता नहीं है | मुझे जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति भी नहीं चाहिए | मेरा जन्म इस धारा-धाम पर बा-बार क्यों न हो, मुझे धनैश्वर्य से हीन, दरिद्र ही क्यों न रहना पड़े, पुत्र-कलत्र से रहित एकाकी जीवन ही क्यों न बिताऊँ, धर्माधर्म या कर्त्तव्य –अकर्तव्य के ज्ञान से हीन बनके क्यों न रहूँ—पर आपके चरणों में मेरी अविचल भक्ति बनी रहे, यही मेरे जीवन की सर्वसिद्धि है, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा धनैश्वर्य है, यही मेरा परम पुरुषार्थ है, यही मेरे जीवन की परम गति है |
मोक्ष प्राप्त करने वाले क्या जानें भगवद्भक्ति का स्वाद ! वे तो राममय हो जाते हैं, राम ही बन जाते हैं | बार-बार जीवन धारणकर आजन्म भक्ति के नशे में झूमने वाले भक्तों के उस आनंद की समता “निर्वाण” नहीं कर सकता | जिसकी जिव्हा पर श्रीराम के नामोच्चार का चस्का लग गया, उसके लिए चारों पदार्थ मिट्टी हैं ! मिट्टी !!
{कल्याण-वर्ष ८८,संख्या ७)


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