शनिवार, 1 अप्रैल 2023

श्रीसीतारामाभ्यां नम:

“परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।
मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।“

( जीव परतंत्र है, भगवान् स्वतंत्र हैं। जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि माया का किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन के बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता )

-----श्रीरामचरितमानस(उत्तरकाण्ड), पुस्तक कोड-81, गीताप्रेस गोरखपुर


3 टिप्‍पणियां:

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७) भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन हिरण्मयेऽपि भगवान्निवसति...