मंगलवार, 13 जनवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन

हिरण्मयेऽपि भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषैः पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति ||२९||
ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुणविशेषणायानुपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे
नमो भूम्ने नमो नमोऽवस्थानाय नमस्ते ||३०||
यद्रूपमेतन्निजमाययार्पितमर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम्
सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ||३१||
जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम्
द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ||३२||
यस्मिन्नसङ्ख्येयविशेषनाम रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम्
सङ्ख्या यया तत्त्वदृशापनीयते तस्मै नमः साङ्ख्यनिदर्शनाय ते इति ||३३||

हिरण्मयवर्षमें भगवान्‌ कच्छपरूप धारण करके रहते हैं। वहाँके निवासियोंके सहित पितृराज अर्यमा भगवान्‌की उस प्रियतम मूर्तिकी उपासना करते हैं और इस मन्त्र[5] को निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं ॥ २९ ॥ —
‘जो सम्पूर्ण सत्त्वगुणसे युक्त हैं, जलमें विचरते रहनेके कारण जिनके स्थानका कोई निश्चय नहीं है तथा जो कालकी मर्यादाके बाहर हैं, उन ओङ्कारस्वरूप सर्वव्यापक सर्वाधार भगवान्‌ कच्छपको बार-बार नमस्कार है’ ॥ ३० ॥
भगवन् ! अनेक रूपोंमें प्रतीत होनेवाला यह दृश्यप्रपञ्च यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुत: कोई संख्या नहीं है; तथापि यह मायासे प्रकाशित होनेवाला आपका ही रूप है। ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥ एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जङ्गम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियोंसे युक्त हैं; कपिलादि विद्वानोंने जो आपमें चौबीस तत्त्वोंकी संख्या निश्चित की है—वह जिस तत्त्वदृष्टिका उदय होनेपर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुत: आपका ही स्वरूप हैं। ऐसे सांख्यसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है’ ॥ ३३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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