मंगलवार, 25 नवंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - उनतीसवां अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – उनतीसवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

पुरञ्जनोपाख्यानका तात्पर्य

एवं पञ्चविधं लिङ्‌गं त्रिवृत्षोडश विस्तृतम् ।
एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७४ ॥
अनेन पुरुषो देहान् उपादत्ते विमुञ्चति ।
हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥ ७५ ॥
यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ।
न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जनः ॥ ७६ ॥
अदृष्टं दृष्टवन्नङ्‌क्षेद्‍भूतं स्वप्नवदन्यथा ।
भूतं भवद्‍भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहोरहः ॥ ७७ ॥
यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् ।
मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥ ७७ ॥
यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् ।
सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः ॥ ७८ ॥
अतस्तद् अपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् ।
पश्यन् तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥ ७९ ॥

इस प्रकार पञ्चतन्मात्राओं से बना हुआ तथा सोलह तत्त्वोंके रूपमें विकसित यह त्रिगुणमय सङ्घात ही लिङ्गशरीर है। यही चेतनाशक्तिसे युक्त होकर जीव कहा जाता है ॥ ७४ ॥ इसीके द्वारा पुरुष भिन्न-भिन्न देहोंको ग्रहण करता और त्यागता है तथा इसीसे उसे हर्ष, शोक, भय, दु:ख और सुख आदिका अनुभव होता है ॥ ७५ ॥ जिस प्रकार जोंक, जब तक दूसरे तृण को नहीं पकड़ लेती, तबतक पहलेको नहीं छोड़ती—उसी प्रकार जीव मरणकाल उपस्थित होनेपर भी जब तक देहारम्भक कर्मों की समाप्ति होने पर दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक पहले शरीरके अभिमान को नहीं छोड़ता। राजन् ! यह मन:प्रधान लिङ्गशरीर ही जीवके जन्मादिका कारण है ॥ ७६-७७ ॥ जीव जब इन्द्रियजनित भोगोंका चिन्तन करते हुए बार-बार उन्हींके लिये कर्म करता है, तब उन कर्मोंके होते रहनेसे अविद्यावश वह देहादिके कर्मोंमें बँध जाता है ॥ ७८ ॥ अतएव उस कर्मबन्धनसे छुटकारा पानेके लिये सम्पूर्ण विश्वको भगवद्रूप देखते हुए सब प्रकार श्रीहरिका भजन करो। उन्हींसे इस विश्वकी उत्पत्ति और स्थिति होती है तथा उन्हींमें लय होता है ॥ ७९ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐💟🥀🌾जय श्रीहरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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