॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०८)
यम और यमदूतोंका संवाद
तस्मात्सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम्
महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतम् || ३१||
शृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहुः
यथा सुजातया भक्त्या शुद्ध्येन्नात्मा व्रतादिभिः ||३२||
कृष्णाङ्घ्रिपद्ममधुलिण् न पुनर्विसृष्ट
मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु
अन्यस्तु कामहत आत्मरजः प्रमार्ष्टुम्
ईहेत कर्म यत एव रजः पुनः स्यात् ||३३||
इत्थं स्वभर्तृगदितं भगवन्महित्वं
संस्मृत्य विस्मितधियो यमकिङ्करास्ते
नैवाच्युताश्रयजनं प्रतिशङ्कमाना
द्रष्टुं च बिभ्यति ततः प्रभृति स्म राजन् ||३४||
इतिहासमिमं गुह्यं भगवान्कुम्भसम्भवः
कथयामास मलय आसीनो हरिमर्चयन् ||३५||
श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! इसलिये तुम ऐसा समझ लो कि बड़े-से-बड़े पापोंका सर्वोत्तम, अन्तिम और पाप-वासनाओंको भी निर्मूल कर डालनेवाला प्रायश्चित्त यही है कि केवल भगवान्के गुणों, लीलाओं और नामोंका कीर्तन किया जाय। इसीसे संसारका कल्याण हो सकता है ॥ ३१ ॥ जो लोग बार-बार भगवान्के उदार और कृपापूर्ण चरित्रोंका श्रवण-कीर्तन करते हैं, उनके हृदयमें प्रेममयी भक्तिका उदय हो जाता है। उस भक्तिसे जैसी आत्मशुद्धि होती है, वैसी कृच्छ्र- चान्द्रायण आदि व्रतोंसे नहीं होती ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्द-मकरन्द- रसका लोभी भ्रमर है, वह स्वभावसे ही मायाके आपातरम्य, दु:खद और पहलेसे ही छोड़े हुए विषयोंमें फिर नहीं रमता। किन्तु जो लोग उस दिव्य रससे विमुख हैं कामनाओंने जिनकी विवेकबुद्धिपर पानी फेर दिया है, वे अपने पापोंका मार्जन करनेके लिये पुन: प्रायश्चित्तरूप कर्म ही करते हैं। इससे होता यह है कि उनके कर्मोंकी वासना मिटती नहीं और वे फिर वैसे ही दोष कर बैठते हैं ॥ ३३ ॥ परीक्षित् ! जब यमदूतों ने अपने स्वामी धर्मराज के मुखसे इस प्रकार भगवान् की महिमा सुनी और उसका स्मरण किया, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। तभीसे वे धर्मराज की बातपर विश्वास करके अपने नाश की आशङ्का से भगवान् के आश्रित भक्तों के पास नहीं जाते। और तो क्या, वे उनकी ओर आँख उठाकर देखने में भी डरते हैं ॥ ३४ ॥ प्रिय परीक्षित् ! यह इतिहास परम गोपनीय—अत्यन्त रहस्यमय है। मलयपर्वत पर विराजमान भगवान् अगस्त्यजी ने श्रीहरि की पूजा करते समय मुझे यह सुनाया था ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे यमपुरुषसंवादे तृतीयोऽध्यायः
शेष आगामी पोस्ट में --
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