श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
श्रीराजोवाच
देवासुरनृणां सर्गो नागानां मृगपक्षिणाम्
सामासिकस्त्वया प्रोक्तो यस्तु स्वायम्भुवेऽन्तरे ||१||
तस्यैव व्यासमिच्छामि ज्ञातुं ते भगवन्यथा
अनुसर्गं यया शक्त्या ससर्ज भगवान्परः ||२||
श्रीसूत उवाच
इति सम्प्रश्नमाकर्ण्य राजर्षेर्बादरायणिः
प्रतिनन्द्य महायोगी जगाद मुनिसत्तमाः ||३||
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन् आपने संक्षेप से (तीसरे स्कन्ध में) इस बात का वर्णन किया कि स्वायम्भुव मन्वन्तर में देवता, असुर, मनुष्य, सर्प और पशु-पक्षी आदि की सृष्टि कैसे हुई ॥ १ ॥ अब मैं उसी का विस्तार जानना चाहता हूँ। प्रकृति आदि कारणों के भी परम कारण भगवान् अपनी जिस शक्ति से जिस प्रकार उसके बाद की सृष्टि करते हैं, उसे जानने की भी मेरी इच्छा है ॥ २ ॥
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो ! परम योगी व्यासनन्दन श्रीशुकदेवजी ने राजर्षि परीक्षित् का यह सुन्दर प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ॥ ३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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