॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
श्रीशुक उवाच
यदा प्रचेतसः पुत्रा दश प्राचीनबर्हिषः
अन्तःसमुद्रादुन्मग्ना ददृशुर्गां द्रुमैर्वृताम् ||४||
द्रुमेभ्यः क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यवः
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया ||५||
ताभ्यां निर्दह्यमानांस्तानुपलभ्य कुरूद्वह
राजोवाच महान्सोमो मन्युं प्रशमयन्निव ||६||
न द्रुमेभ्यो महाभागा दीनेभ्यो द्रोग्धुमर्हथ
विवर्धयिषवो यूयं प्रजानां पतयः स्मृताः ||७||
अहो प्रजापतिपतिर्भगवान्हरिरव्ययः
वनस्पतीनोषधीश्च ससर्जोर्जमिषं विभुः ||८||
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजा प्राचीनबर्हि के दस लडक़े—जिनका नाम प्रचेता था—जब समुद्र से बाहर निकले, तब उन्होंने देखा कि हमारे पिता के निवृत्तिपरायण हो जानेसे सारी पृथ्वी पेड़ों से घिर गयी है ॥ ४ ॥ उन्हें वृक्षों पर बड़ा क्रोध आया। उनके तपोबल ने तो मानो क्रोध की आगमें आहुति ही डाल दी। बस, उन्होंने वृक्षों को जला डालनेके लिये अपने मुखसे वायु और अग्नि की सृष्टि की ॥ ५ ॥ परीक्षित् ! जब प्रचेताओंकी छोड़ी हुई अग्नि और वायु उन वृक्षोंको जलाने लगी, तब वृक्षों के राजाधिराज चन्द्रमा ने उनका क्रोध शान्त करते हुए इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥ ‘महाभाग्यवान् प्रचेताओ ! ये वृक्ष बड़े दीन हैं। आपलोग इनसे द्रोह मत कीजिये; क्योंकि आप तो प्रजाकी अभिवृद्धि करना चाहते हैं और सभी जानते हैं कि आप प्रजापति हैं ॥ ७ ॥ महात्मा प्रचेताओ ! प्रजापतियोंके अधिपति अविनाशी भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण वनस्पतियों और ओषधियोंको प्रजाके हितार्थ उनके खान-पानके लिये बनाया है ॥ ८ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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