गुरुवार, 5 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०३)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

अन्नं चराणामचरा ह्यपदः पादचारिणाम्
अहस्ता हस्तयुक्तानां द्विपदां च चतुष्पदः ||९||
यूयं च पित्रान्वादिष्टा देवदेवेन चानघाः
प्रजासर्गाय हि कथं वृक्षान्निर्दग्धुमर्हथ ||१०||
आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम्
पित्रा पितामहेनापि जुष्टं वः प्रपितामहैः ||११||
तोकानां पितरौ बन्धू दृशः पक्ष्म स्त्रियाः पतिः
पतिः प्रजानां भिक्षूणां गृह्यज्ञानां बुधः सुहृत् ||१२||
अन्तर्देहेषु भूतानामात्मास्ते हरिरीश्वरः
सर्वं तद्धिष्ण्यमीक्षध्वमेवं वस्तोषितो ह्यसौ ||१३||
यः समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम्
आत्मजिज्ञासया यच्छेत्स गुणानतिवर्तते ||१४||
अलं दग्धैर्द्रुमैर्दीनैः खिलानां शिवमस्तु वः
वार्क्षी ह्येषा वरा कन्या पत्नीत्वे प्रतिगृह्यताम् ||१५||

संसारमें पाँखोंसे उडऩेवाले चर प्राणियोंके भोजन फल-पुष्पादि अचर पदार्थ हैं। पैरसे चलनेवालों के घास-तृणादि बिना पैरवाले पदार्थ भोजन हैं; हाथवालोंके वृक्ष-लता आदि बिना हाथवाले और दो पैरवाले मनुष्यादिके लिये धान, गेहूँ आदि अन्न भोजन हैं। चार पैरवाले बैल, ऊँट आदि खेती प्रभृति के द्वारा अन्न की उत्पत्ति में सहायक हैं ॥ ९ ॥ निष्पाप प्रचेताओ! आपके पिता और देवाधिदेव भगवान्‌ ने आप लोगों को यह आदेश दिया है कि प्रजा की सृष्टि करो। ऐसी स्थिति में आप वृक्षोंको जला डालें, यह कैसे उचित हो सकता है ॥ १० ॥ आपलोग अपना क्रोध शान्त करें और अपने पिता, पितामह, प्रपितामह आदिके द्वारा सेवित सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करें ॥ ११ ॥ जैसे मा-बाप बालकोंकी, पलकें नेत्रोंकी, पति पत्नीकी, गृहस्थ भिक्षुकोंकी और ज्ञानी अज्ञानियोंकी रक्षा करते हैं और उनका हित चाहते हैं—वैसे ही प्रजाकी रक्षा और हितका उत्तरदायी राजा होता है ॥ १२ ॥ प्रचेताओ ! समस्त प्राणियोंके हृदयमें सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ आत्माके रूपमें विराजमान हैं। इसलिये आपलोग सभीको भगवान्‌का निवासस्थान समझें। यदि आप ऐसा करेंगे तो भगवान्‌ को प्रसन्न कर लेंगे ॥ १३ ॥ जो पुरुष हृदयके उबलते हुए भयङ्कर क्रोधको आत्मविचारके द्वारा शरीरमें ही शान्त कर लेता है, बाहर नहीं निकलने देता, वह कालक्रमसे तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥ प्रचेताओ ! इन दीन-हीन वृक्षोंको और न जलाइये; जो कुछ बच रहे हैं, उनकी रक्षा कीजिये। इससे आपका भी कल्याण होगा। इस श्रेष्ठ कन्याका पालन इन वृक्षोंने ही किया है, इसे आपलोग पत्नीके रूपमें स्वीकार कीजिये’ ॥ १५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹🩷🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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