शनिवार, 25 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

अथ काल उपावृत्ते कुमारः समजायत । 
जनयन् शूरसेनानां श्रृण्वतां परमां मुदम् ॥ ३२ ॥
हृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचिरलङ्‌कृतः । 
वाचयित्वाशिषो विप्रैः कारयामास जातकम् ॥ ३३ ॥
तेभ्यो हिरण्यं रजतं वासांस्याभरणानि च । 
ग्रामान् हयान् गजान् प्रादाद् धेनूनां अर्बुदानि षट् ॥ ३४ ॥
ववर्ष कामानन्येषां पर्जन्य इव देहिनाम् । 
धन्यं यशस्यमायुष्यं कुमारस्य महामनाः ॥ ३५ ॥
कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेः तनयेऽनुदिनं पितुः । 
यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत ॥ ३६ ॥

तदनन्तर समय आनेपर महारानी कृतद्युतिके गर्भसे एक सुन्दर पुत्रका जन्म हुआ। उसके जन्म- का समाचार पाकर शूरसेन देश की प्रजा बहुत ही आनन्दित हुई ॥ ३२ ॥ सम्राट् चित्रकेतु के आनन्द- का तो कहना ही क्या था। वे स्नान करके पवित्र हुए। फिर उन्होंने वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हो, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर और आशीर्वाद लेकर पुत्र का जातकर्म-संस्कार करवाया ॥ ३३ ॥ उन्होंने उन ब्राह्मणोंको सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण, गाँव, घोड़े, हाथी और छ: अर्बुद गौएँ दान कीं ॥ ३४ ॥ उदारशिरोमणि राजा चित्रकेतुने पुत्रके धन, यश और आयुकी वृद्धि के लिये दूसरे लोगोंको भी मुँहमाँगी वस्तुएँ दीं—ठीक उसी प्रकार जैसे मेघ सभी जीवों का मनोरथ पूर्ण करता है ॥ ३५ ॥ परीक्षित्‌ ! जैसे यदि किसी कंगालको बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा ॥ ३६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र अथ काल उपावृत्ते कुमारः समज...