॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)
वृत्रासुर का पूर्वचरित्र
श्रीशुक उवाच –
इत्यर्थितः स भगवान्कृपालुर्ब्रह्मणः सुतः ।
श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारमयजद् विभुः ॥ २७ ॥
ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणां च भारत ।
नाम्ना कृतद्युतिस्तस्यै यज्ञोच्छिष्टमदाद् द्विजः ॥ २८ ॥
अथाह नृपतिं राजन् भवितैकस्तवात्मजः ।
हर्षशोकप्रदस्तुभ्यं इति ब्रह्मसुतो ययौ ॥ २९ ॥
सापि तत्प्राशनादेव चित्रकेतोरधारयत् ।
गर्भं कृतद्युतिर्देवी कृत्तिकाग्नेरिवात्मजम् ॥ ३० ॥
तस्या अनुदिनं गर्भः शुक्लपक्ष इवोडुपः ।
ववृधे शूरसेनेश तेजसा शनकैर्नृप ॥ ३१ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! जब राजा चित्रकेतुने इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वसमर्थ एवं परम कृपालु ब्रह्मपुत्र भगवान् अङ्गिराने त्वष्टा देवताके योग्य चरु निर्माण करके उससे उनका यजन किया ॥ २७ ॥ परीक्षित् ! राजा चित्रकेतुकी रानियोंमें सबसे बड़ी और सद्गुणवती महारानी कृतद्युति थीं। महर्षि अङ्गिराने उन्हींको यज्ञका अवशेष प्रसाद दिया ॥ २८ ॥ और राजा चित्रकेतुसे कहा—‘राजन् ! तुम्हारी पत्नीके गर्भसे एक पुत्र होगा, जो तुम्हें हर्ष और शोक दोनों ही देगा।’ यों कहकर अङ्गिरा ऋषि चले गये ॥ २९ ॥ उस यज्ञावशेष प्रसादके खानेसे ही महारानी कृतद्युति ने महाराज चित्रकेतुके द्वारा गर्भ धारण किया, जैसे कृत्तिकाने अपने गर्भमें अग्निकुमार को धारण किया था ॥ ३० ॥ राजन् ! शूरसेन देशके राजा चित्रकेतुके तेजसे कृतद्युति का गर्भ शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान दिनोंदिन क्रमश: बढऩे लगा ॥ ३१ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें