॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)
वृत्रासुर का पूर्वचरित्र
मातुस्त्वतितरां पुत्रे स्नेहो मोहसमुद्भवः ।
कृतद्युतेः सपत्नीनां प्रजाकामज्वरोऽभवत् ॥ ३७ ॥
चित्रकेतोः अतिप्रीतिः यथा दारे प्रजावति ।
न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम् ॥ ३८ ॥
ताः पर्यतप्यन् आत्मानं गर्हयन्त्योऽभ्यसूयया ।
आनपत्येन दुःखेन राज्ञोऽनादरणेन च ॥ ३९ ॥
धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम् ।
सुप्रजाभिः सपत्नीभिः दासीमिव तिरस्कृताम् ॥ ४० ॥
दासीनां को नु सन्तापः स्वामिनः परिचर्यया ।
अभीक्ष्णं लब्धमानानां दास्या दासीव दुर्भगाः ॥ ४१ ॥
माता कृतद्युति को भी अपने पुत्र पर मोह के कारण बहुत ही स्नेह था । परंतु उनकी सौत रानियों के मनमें पुत्रकी कामनासे और भी जलन होने लगी ॥ ३७ ॥ प्रतिदिन बालकका लाड़-प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा ॥ ३८ ॥ इस प्रकार एक तो वे रानियाँ सन्तान न होने के कारण ही दुखी थीं, दूसरे राजा चित्रकेतु ने उनकी उपेक्षा कर दी। अत: वे डाह से अपने को धिक्कारने और मन-ही-मन जलने लगीं ॥ ३९ ॥ वे आपसमें कहने लगीं—‘अरी बहिनो ! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है। पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं। और तो और, स्वयं पतिदेव ही उसे पत्नी करके नहीं मानते। सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कार के योग्य है ॥ ४० ॥ भला, दासियों को क्या दु:ख है ? वे तो अपने स्वामी की सेवा करके निरन्तर सम्मान पाती रहती हैं । परंतु हम अभागिनी तो इस समय उनसे भी गयी-बीती हो रही हैं और दासियों की दासी के समान बार-बार तिरस्कार पा रही हैं ॥ ४१ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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