मंगलवार, 3 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

यम और यमदूतोंका संवाद

तानानयध्वमसतो विमुखान्मुकुन्द
पादारविन्दमकरन्दरसादजस्रम्
निष्किञ्चनैः परमहंसकुलैरसङ्गैर्
जुष्टाद्गृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान् ||२८||
जिह्वा न वक्ति भगवद्गुणनामधेयं
चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम्
कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापि
तानानयध्वमसतोऽकृतविष्णुकृत्यान् ||२९||
तत्क्षम्यतां स भगवान्पुरुषः पुराणो
नारायणः स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं नः
स्वानामहो न विदुषां रचिताञ्जलीनां
क्षान्तिर्गरीयसि नमः पुरुषाय भूम्ने ||३०||

बड़े-बड़े परमहंस दिव्य रसके लोभ से सम्पूर्ण जगत् और शरीर आदिसे भी अपनी अहंता-ममता हटाकर, अकिञ्चन होकर निरन्तर भगवान्‌ मुकुन्द के पादारविन्दका मकरन्द-रस पान करते रहते हैं। जो दुष्ट उस दिव्य रससे विमुख हैं और नरक के दरवाजे घर-गृहस्थी की तृष्णा का बोझा बाँध कर उसे ढो रहे हैं, उन्हीं को मेरे पास बार-बार लाया करो ॥ २८ ॥ जिन की जीभ भगवान्‌ के गुणों और नामों का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके  चरणारविन्दों का चिन्तन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में नहीं झुकता, उन भगवत्सेवाविमुख पापियों को ही मेरे पास लाया करो ॥ २९ ॥ आज मेरे दूतों ने भगवान्‌ के पार्षदों का अपराध करके स्वयं भगवान्‌ का ही तिरस्कार किया है। यह मेरा ही अपराध है। पुराणपुरुष भगवान्‌ नारायण हमलोगों का यह अपराध क्षमा करें। हम अज्ञानी होनेपर भी हैं उनके निजजन, और उनकी आज्ञा पानेके लिये अञ्जलि बाँधकर सदा उत्सुक रहते हैं। अत: परम महिमान्वित भगवान्‌के लिये यही योग्य है कि वे क्षमा कर दें। मैं उन सर्वान्तर्यामी एकरस अनन्त प्रभुको नमस्कार करता हूँ ॥ ३० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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