रविवार, 30 नवंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - इकतीसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – इकतीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ

मैत्रेय उवाच -
तत उत्पन्नविज्ञाना आश्वधोक्षजभाषितम् ।
स्मरन्त आत्मजे भार्यां विसृज्य प्राव्रजन् गृहात् ॥ १ ॥
दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा ।
प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद् यत्र जाजलिः ॥ २ ॥
तान्निर्जितप्राणमनोवचोदृशो
     जितासनान् शान्तसमानविग्रहान् ।
परेऽमले ब्रह्मणि योजितात्मनः
     सुरासुरेड्यो ददृशे स्म नारदः ॥ ३ ॥
तमागतं त उत्थाय प्रणिपत्याभिनन्द्य च ।
पूजयित्वा यथादेशं सुखासीनं अथाब्रुवन् ॥ ४ ॥

प्रचेतस ऊचुः -
स्वागतं ते सुरर्षेऽद्य दिष्ट्या नो दर्शनं गतः ।
तव चङ्‌क्रमणं ब्रह्मन् अभयाय यथा रवेः ॥ ५ ॥
यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च ।
तद्‍गृहेषु प्रसक्तानां प्रायशः क्षपितं प्रभो ॥ ॥ ६ ॥
तन्नः प्रद्योतयाध्यात्म ज्ञानं तत्त्वार्थदर्शनम् ।
येनाञ्जसा तरिष्यामो दुस्तरं भवसागरम् ॥ ७ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी ! दस लाख वर्ष बीत जानेपर जब प्रचेताओंको विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान्‌के वाक्योंकी याद आयी और वे अपनी भार्या मारिषाको पुत्रके पास छोडक़र तुरंत घरसे निकल पड़े ॥ १ ॥ वे पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर—जहाँ जाजलि मुनिने सिद्धि प्राप्त की थी—जा पहुँचे और जिससे ‘समस्त भूतोंमें एक ही आत्मतत्त्व विराजमान है’ ऐसा ज्ञान होता है, उस आत्मविचाररूप ब्रह्मसत्रका सङ्कल्प करके बैठ गये ॥ २ ॥ उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टिको वशमें किया तथा शरीरको निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसनको जीतकर चित्तको विशुद्ध परब्रह्ममें लीन कर दिया। ऐसी स्थितिमें उन्हें देवता और असुर दोनोंके ही वन्दनीय श्रीनारदजीने देखा ॥ ३ ॥ नारदजीको आया देख प्रचेतागण खड़े हो गये और प्रणाम करके आदर-सत्कारपूर्वक देश-कालानुसार उनकी विधिवत् पूजा की। जब नारदजी सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे कहने लगे ॥ ४ ॥
प्रचेताओंने कहा—देवर्षे ! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्यसे हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन् ! सूर्यके समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोक से समस्त जीवोंको अभय-दान देनेके लिये ही होता है ॥ ५ ॥ प्रभो ! भगवान्‌ शङ्कर और श्रीविष्णु भगवान्‌ ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थीमें आसक्त रहनेके कारण हमलोग प्राय: भूल गये हैं ॥ ६ ॥ अत: आप हमारे हृदयोंमें उस परमार्थतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले अध्यात्मज्ञानको फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमतासे ही इस दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायँ ॥ ७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - इकतीसवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  चतुर्थ स्कन्ध – इकतीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ ...