॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
चतुर्थ स्कन्ध – उनतीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
पुरञ्जनोपाख्यानका तात्पर्य
अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरंपरा ।
संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥ ३६ ॥
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः ।
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥ ३७ ॥
सोऽचिराद् एव राजर्षे स्याद् अच्युतकथाश्रयः ।
श्रृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥ ३८ ॥
यत्र भागवता राजन्साधवो विशदाशयाः ।
भगवद्गुणानुकथन श्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ३९ ॥
तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र
पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति ।
ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णैः
तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ ४० ॥
एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः ।
न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ ४१ ॥
प्रजापतिपतिः साक्षाद् भगवान् गिरिशो मनुः ।
दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४२ ॥
मरीचिः अत्रि अङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥ ४३ ॥
अद्यापि वाचस्पतयः तपोविद्यासमाधिभिः ।
पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥ ४४ ॥
शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।
मन्त्रलिङ्गैः व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४५ ॥
यदा यस्य अनुगृह्णाति भगवान् आत्मभावितः ।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४६ ॥
(नारद जी राजा प्राचीनबर्हि से कह रहे हैं) राजन् ! जिस अविद्याके कारण परमार्थस्वरूप आत्माको यह जन्म-मरणरूप अनर्थपरम्परा प्राप्त हुई है, उसकी निवृत्ति गुरुस्वरूप श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति होनेपर हो सकती है ॥ ३६ ॥ भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है ॥ ३७ ॥ राजर्षे ! यह भक्तिभाव भगवान्की कथाओंके आश्रित रहता है। इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ३८ ॥ राजन् ! जहाँ भगवद्गुणोंको कहने और सुननेमें तत्पर विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु-समाजमें सब ओर महापुरुषोंके मुखसे निकले हुए श्रीमधुसूदनभगवान्के चरित्ररूप शुद्ध अमृतकी अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं। जो लोग अतृप्तचित्तसे श्रवणमें तत्पर अपने कर्णकुहरोंद्वारा उस अमृतका छककर पान करते हैं, उन्हें भूख-प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते ॥ ३९-४० ॥ हाय ! स्वभावत: प्राप्त होनेवाले इन क्षुधा-पिपासादि विघ्रोंसे सदा घिरा हुआ जीव समुदाय श्रीहरिके कथामृत-सिन्धुसे प्रेम नहीं करता ॥ ४१ ॥ साक्षात् प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी, भगवान् शङ्कर, स्वायम्भुव मनु, दक्षादि प्रजापतिगण, सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं—ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं, समस्त वाङ्मयके अधिपति होनेपर भी तप, उपासना और समाधिके द्वारा ढूँढ़-ढूँढक़र हार गये, फिर भी उस सर्वसाक्षी परमेश्वरको आजतक न देख सके ॥ ४२—४४ ॥ वेद भी अत्यन्त विस्तृत हैं, उसका पार पाना हँसी-खेल नहीं है। अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रोंमें बताये हुए वज्रहस्तत्वादि गुणोंसे युक्त इन्द्रादि देवताओंके रूपमें, भिन्न-भिन्न कर्मोंके द्वारा, यद्यपि उस परमात्माका ही यजन करते हैं तथापि उसके स्वरूपको वे भी नहीं जानते ॥ ४५ ॥ हृदयमें बार-बार चिन्तन किये जानेपर भगवान् जिस समय जिस जीवपर कृपा करते हैं, उसी समय वह लौकिक व्यवहार एवं वैदिक कर्म-मार्गकी बद्धमूल आस्थासे छुट्टी पा जाता है ॥ ४६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌺💖🥀🌺जय श्रीहरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंनारायण नारायण नारायण नारायण !!हरि:शरणम् !! हरि: शरणम् !! हरि शरणम् ही केवलम 🙏