सोमवार, 29 दिसंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध - तेरहवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

भवाटवीका वर्णन और रहूगणका संशयनाश

शूरैर्हृतस्वः क्व च निर्विण्णचेताः शोचन्विमुह्यन्नुपयाति कश्मलम्
क्वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्टः प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम् ||७||
चलन्क्वचित्कण्टकशर्कराङ्घ्रिर्नगारुरुक्षुर्विमना इवास्ते
पदे पदेऽभ्यन्तरवह्निनार्दितः कौटुम्बिकः क्रुध्यति वै जनाय ||८||
क्वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः
दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकैरन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे ||९||
कर्हि स्म चित्क्षुद्र रसान्विचिन्वंस्तन्मक्षिकाभिर्व्यथितो विमानः
तत्रातिकृच्छ्रात्प्रतिलब्धमानो बलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोऽन्ये ||१०||
क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते
क्वचिन्मिथो विपणन्यच्च किञ्चिद्विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ||११||
क्वचित्क्वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन्शय्यासनस्थानविहारहीनः
याचन्परादप्रतिलब्धकामः पारक्यदृष्टिर्लभतेऽवमानम् ||१२||
अन्योन्यवित्तव्यतिषङ्गवृद्ध वैरानुबन्धो विवहन्मिथश्च
अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छ्रवित्त बाधोपसर्गैर्विहरन्विपन्नः ||१३||

कभी अपनेसे अधिक बलवान लोग इसका धन छीन लेते हैं, तो यह दुखी होकर शोक और मोहसे अचेत हो जाता है और कभी गन्धर्वनगरमें पहुँचकर घड़ीभरके लिये सब दु:ख भूलकर खुशी मनाने लगता है ॥ ७ ॥ कभी पर्वतोंपर चढऩा चाहता है तो काँटे और कंकड़ोंद्वारा पैर चलनी हो जानेसे उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्तिका साधन नहीं होता तो भूखकी ज्वालासे सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवोंपर खीझने लगता है ॥ ८ ॥ कभी अजगर सर्पका ग्रास बनकर वनमें फेंके हुए मुर्देके समान पड़ा रहता है। उस समय इसे कोई सुध-बुध नहीं रहती। कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विषके प्रभावसे अंधा होकर किसी अँधे कुएँमें गिर पड़ता है और घोर दु:खमय अन्धकारमें बेहोश पड़ा रहता है ॥ ९ ॥ कभी मधु खोजने लगता है तो मक्खियाँ इसके नाकमें दम कर देती हैं और इसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है। यदि किसी प्रकार अनेकों कठिनाइयोंका सामना करके वह मिल भी गया तो बलात् दूसरे लोग उसे छीन लेते हैं ॥ १० ॥ कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षासे अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हो जाता है। कभी आपसमें थोड़ा-बहुत व्यापार करता है, तो धनके लोभसे दूसरोंको धोखा देकर उनसे वैर ठान लेता है ॥ ११ ॥ कभी-कभी उस संसारवनमें इसका धन नष्ट हो जाता है तो इसके पास शय्या, आसन, रहनेके लिये स्थान और सैर-सपाटेके लिये सवारी आदि भी नहीं रहते। तब दूसरोंसे याचना करता है; माँगनेपर भी दूसरेसे जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तब परायी वस्तुओंपर अनुचित दृष्टि रखनेके कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है ॥ १२ ॥ इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्धके कारण एक-दूसरेसे द्वेषभाव बढ़ जानेपर भी वह वणिक्समूह आपसमें विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर इस मार्गमें तरह-तरहके कष्ट और धनक्षय आदि संकटोंको भोगते-भोगते मृतकवत् हो जाता है ॥ १३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐🌺💐जय श्रीकृष्ण गोविंद🙏
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन स्त्रियो व्रतैस्त्वा हृष...