॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)
श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
नानुभूय न जानाति पुमान्विषयतीक्ष्णताम्
निर्विद्यते स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ||४१||
यन्नस्त्वं कर्मसन्धानां साधूनां गृहमेधिनाम्
कृतवानसि दुर्मर्षं विप्रियं तव मर्षितम् ||४२||
तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः
तस्माल्लोकेषु ते मूढ न भवेद्भ्रमतः पदम् ||४३||
श्रीशुक उवाच
प्रतिजग्राह तद्बाढं नारदः साधुसम्मतः
एतावान्साधुवादो हि तितिक्षेतेश्वरः स्वयम् ||४४||
नारद ! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता। इसलिये उनकी दु:खरूपता का अनुभव होने पर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकाने से नहीं होता ॥ ४१ ॥ हमलोग सद्गृहस्थ हैं, अपनी धर्ममर्यादा का पालन करते हैं। एक बार पहले भी तुमने हमारा असह्य अपकार किया था। तब हमने उसे सह लिया ॥ ४२ ॥ तुम तो हमारी वंशपरम्परा का उच्छेद करने पर ही उतारू हो रहे हो। तुमने फिर हमारे साथ वही दुष्टताका व्यवहार किया। इसलिये मूढ़ ! जाओ, लोक-लोकान्तरोंमें भटकते रहो। कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरनेको ठौर नहीं होगी ॥ ४३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! संतशिरोमणि देवर्षि नारद ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर दक्ष का शाप स्वीकार कर लिया। संसार में बस, साधुता इसी का नाम है कि बदला लेने की शक्ति रहनेपर भी दूसरे का किया हुआ अपकार सह लिया जाय ॥ ४४ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदशापो नाम पञ्चमोऽध्यायः
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀जय श्री हरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंॐ नमो भगवते वासुदेवाय
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि :