॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण
श्रीशुक उवाच -
एवं कृतव्यवसितो दध्यङ्ङाथर्वणस्तनुम् ।
परे भगवति ब्रह्मणि आत्मानं सन्नयन्जहौ ॥ ११ ॥
यताक्षासुमनोबुद्धिः तत्त्वदृग् ध्वस्तबन्धनः ।
आस्थितः परमं योगं न देहं बुबुधे गतम् ॥ १२ ॥
अथेन्द्रो वज्रमुद्यम्य निर्मितं विश्वकर्मणा ।
मुनेः शक्तिभिरुत्सिक्तो भगवत् तेजसान्वितः ॥ १३ ॥
वृतो देवगणैः सर्वैः गजेन्द्रोपर्यशोभत ।
स्तूयमानो मुनिगणैः त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥ १४ ॥
वृत्रमभ्यद्रवच्छत्रुं असुरानीकयूथपैः ।
पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम् ॥ १५ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! अथर्ववेदी महर्षि दधीचिने ऐसा निश्चय करके अपने को परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान् में लीन करके अपना स्थूल शरीर त्याग दिया ॥ ११ ॥ उनके इन्द्रिय,प्राण,मन और बुद्धि संयत थे, दृष्टि तत्त्वमयी थी, उनके सारे बन्धन कट चुके थे । अत: जब वे भगवान् से अत्यन्त युक्त होकर स्थित हो गये, तब उन्हें इस बातका पता ही न चला कि मेरा शरीर छूट गया ॥ १२ ॥
भगवान् की शक्ति पाकर इन्द्र का बल-पौरुष उन्नति की सीमा पर पहुँच गया। अब विश्वकर्माजी ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वज्र बनाकर उन्हें दिया और वे उसे हाथ में लेकर ऐरावत हाथीपर सवार हुए। उनके साथ-साथ सभी देवतालोग तैयार हो गये। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि देवराज इन्द्र की स्तुति करने लगे। अब उन्होंने त्रिलोकी को हर्षित करते हुए वृत्रासुरका वध करने के लिये उसपर पूरी शक्ति लगाकर धावा बोल दिया—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् रुद्र क्रोधित होकर स्वयं कालपर ही आक्रमण कर रहे हों। परीक्षित् ! वृत्रासुर भी दैत्य-सेनापतियोंकी बहुत बड़ी सेना के साथ मोर्चे पर डटा हुआ था ॥ १३—१५ ॥
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नारायण नारायण नारायण नारायण