॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण
अभ्यर्दयन् असम्भ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः ।
गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्गरतोमरैः ॥ २२ ॥
शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः ।
सर्वतोऽवाकिरन्शस्त्रैः अस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ॥ २३ ॥
न तेऽदृश्यन्त सञ्छन्नाः शरजालैः समन्ततः ।
पुङ्खानुपुङ्खपतितैः ज्योतींषीव नभोघनैः ॥ २४ ॥
न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् ।
छिन्नाः सिद्धपथे देवैः लघुहस्तैः सहस्रधा ॥ २५ ॥
अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिश्रृङ्गद्रुमोपलैः ।
अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ॥ २६ ॥
वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानी से देवसेना पर प्रहार करने लगे। उन लोगों ने गदा, परिघ, बाण,प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार,शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि आदि अस्त्र-शस्त्रों की बौछार से देवताओं को सब ओर से ढक दिया ॥ २२-२३ ॥ एक-पर-एक इतने बाण चारों ओर से आ रहे थे कि उनसे ढक जाने के कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे—जैसे बादलों से ढक जाने पर आकाश के तारे नहीं दिखायी देते ॥ २४ ॥ परीक्षित् ! वह शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा देवसैनिकों को छू तक न सकी । उन्होंने अपने हस्तलाघव से आकाश में ही उनके हजार-हजार टुकड़े कर दिये ॥ २५ ॥ जब असुरों के अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वे देवताओं की सेना पर पर्वतों के शिखर, वृक्ष और पत्थर बरसाने लगे । परन्तु देवताओं ने उन्हें पहले-की ही भाँति काट गिराया ॥२६॥
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श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
जवाब देंहटाएंहे नाथ नारायण वासुदेव: !!
नारायण नारायण नारायण नारायण