॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति
श्रीवृत्र उवाच
दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपुः
यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च ।
दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया
मच्छूलनिर्भिन्न दृषद्धृदाचिरात् ॥ १४ ॥
यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजातेः
गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य ।
विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चय्
पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः ॥ १५ ॥
ह्रीश्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां
स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् ।
कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेहं
अस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः ॥ १६ ॥
वृत्रासुर बोला—आज मेरे लिये बड़े सौभाग्य का दिन है कि तुम्हारे-जैसा शत्रु—जिसने विश्वरूप के रूपमें ब्राह्मण, अपने गुरु एवं मेरे भाईकी हत्या की है—मेरे सामने खड़ा है। अरे दुष्ट ! अब शीघ्र-से-शीघ्र मैं तेरे पत्थरके समान कठोर हृदयको अपने शूलसे विदीर्ण करके भाईसे उऋण होऊँगा। अहा ! यह मेरे लिये कैसे आनन्दकी बात होगी ॥ १४ ॥ इन्द्र ! तूने मेरे आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाईके, जो ब्राह्मण होनेके साथ ही यज्ञमें दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवारसे तीनों सिर उतार लिये—ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञमें पशुका सिर काट डालता है ॥ १५ ॥ दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है। तूने ऐसे-ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्योंकी तो बात ही क्या—राक्षसतक करते हैं। आज मेरे त्रिशूल से तेरा शरीर टूक-टूक हो जायगा। बड़े कष्ट से तेरी मृत्यु होगी। तेरे-जैसे पापी को आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच-नोंच कर खायेंगे ॥ १६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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