मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीशुक उवाच – 

विलपन्त्या मृतं पुत्रं इति चित्रविलापनैः । 
चित्रकेतुर्भृशं तप्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥ ५९ ॥
तयोर्विलपतोः सर्वे दम्पत्योस्तदनुव्रताः । 
रुरुदुः स्म नरा नार्यः सर्वमासीदचेतनम् ॥ ६० ॥
एवं कश्मलमापन्नं नष्टसंज्ञमनायकम् । 
ज्ञात्वाङ्‌गिरा नाम मुनिः आजगाम सनारदः ॥ ६१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब सम्राट् चित्रकेतु ने देखा कि मेरी रानी अपने मृत पुत्र के लिये इस प्रकार भाँति-भाँति से विलाप कर रही है, तब वे शोक से अत्यन्त सन्तप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५९ ॥ राजा-रानी के इस प्रकार विलाप करनेपर उनके अनुगामी स्त्री-पुरुष भी दु:खित होकर रोने लगे। इस प्रकार सारा नगर ही शोक से अचेत-सा हो गया ॥ ६० ॥ राजन् ! महर्षि अङ्गिरा और देवर्षि नारद ने देखा कि राजा चित्रकेतु पुत्रशोक के कारण चेतनाहीन हो रहे हैं, यहाँ तक कि उन्हें समझाने वाला भी कोई नहीं है। तब वे दोनों वहाँ आये ॥ ६१ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
षष्ठस्कन्धे चित्रकेतुविलापो नाम चतुर्शोऽध्या‍यः ॥ १४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💫🕉️🌾ॐश्रीपरमात्मने नमः🙏
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

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