शनिवार, 2 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

श्रीशुक उवाच - 

इत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा । 
विस्मिता मुमुचुः शोकं छित्त्वात्म स्नेहश्रृङ्‌खलाम् ॥ १२ ॥
निर्हृत्य ज्ञातयो ज्ञातेः देहं कृत्वोचिताः क्रियाः । 
तत्यजुर्दुस्त्यजं स्नेहं शोकमोहभयार्तिदम् ॥ १३ ॥
बालघ्न्यो व्रीडितास्तत्र बालहत्याहतप्रभाः । 
बालहत्याव्रतं चेरुः ब्राह्मणैः यन्निरूपितम् । 
यमुनायां महाराज स्मरन्त्यो द्विजभाषितम् ॥ १४ ॥ 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—वह जीवात्मा इस प्रकार कहकर चला गया। उसके सगे-सम्बन्धी उसकी बात सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। उनका स्नेह-बन्धन कट गया और उसके मरनेका शोक भी जाता रहा ॥ १२ ॥ इसके बाद जातिवालों ने बालक की मृत देह को ले जाकर तत्कालोचित संस्कार और और्ध्वदैहिक क्रियाएँ पूर्ण कीं और उस दुस्त्यज स्नेह को छोड़ दिया, जिसके कारण शोक, मोह, भय और दु:खकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥ परीक्षित्‌ ! जिन रानियों ने बच्चे को विष दिया था, वे बालहत्याके कारण श्रीहीन हो गयी थीं और लज्जा के मारे आँख तक नहीं उठा सकती थीं। उन्होंने अङ्गिरा ऋषिके उपदेश को याद करके (मात्सर्यहीन हो) यमुनाजीके तटपर ब्राह्मणोंके आदेशानुसार बालहत्याका प्रायश्चित्त किया ॥ १४ ॥  

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹🕉️🥀श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!
    श्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः🙏

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६) गृहस्थसम्बन्धी सदाचार पात्रं त्वत्र निरुक्तं वै कवि...