॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन
ह्रादस्य धमनिर्भार्या सूत वातापिमिल्वलम्
योऽगस्त्याय त्वतिथये पेचे वातापिमिल्वलः ||१५||
अनुह्रादस्य सूर्यायां बाष्कलो महिषस्तथा
विरोचनस्तु प्राह्लादिर्देव्यां तस्याभवद्बलिः ||१६||
बाणज्येष्ठं पुत्रशतमशनायां ततोऽभवत्
तस्यानुभावं सुश्लोक्यं पश्चादेवाभिधास्यते ||१७||
बाण आराध्य गिरिशं लेभे तद्गणमुख्यताम्
यत्पार्श्वे भगवानास्ते ह्यद्यापि पुरपालकः ||१८
मरुतश्च दितेः पुत्राश्चत्वारिंशन्नवाधिकाः
त आसन्नप्रजाः सर्वे नीता इन्द्रेण सात्मताम् ||१९||
ह्राद की पत्नी थी धमनि। उसके दो पुत्र हुए—वातापि और इल्वल। इस इल्वल ने ही महर्षि अगस्त्यके आतिथ्यके समय वातापि को पकाकर उन्हें खिला दिया था ॥ १५ ॥ अनुह्राद की पत्नी सूर्या थी, उसके दो पुत्र हुए— बाष्कल और महिषासुर। प्रह्लादका पुत्र था विरोचन। उसकी पत्नी देवीके गर्भसे दैत्यराज बलिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ बलिकी पत्नी का नाम अशना था। उससे बाण आदि सौ पुत्र हुए। दैत्यराज बलिकी महिमा गान करनेयोग्य है। उसे मैं आगे (आठवें स्कन्धमें) सुनाऊँगा ॥ १७ ॥ बलिका पुत्र बाणासुर भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके गणोंका मुखिया बन गया। आज भी भगवान् शंकर उसके नगर की रक्षा करने के लिये उसके पास ही रहते हैं ॥ १८ ॥ दिति के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के अतिरिक्त उनचास पुत्र और थे। उन्हें मरुद्गण कहते हैं। वे सब नि:सन्तान रहे। देवराज इन्द्र ने उन्हें अपने ही समान देवता बना लिया ॥ १९ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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