मंगलवार, 19 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीकश्यप उवाच

वरं वरय वामोरु प्रीतस्तेऽहमनिन्दिते
स्त्रिया भर्तरि सुप्रीते कः काम इह चागमः ||३२||
पतिरेव हि नारीणां दैवतं परमं स्मृतम्
मानसः सर्वभूतानां वासुदेवः श्रियः पतिः ||३३||
स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः
इज्यते भगवान्पुम्भिः स्त्रीभिश्च पतिरूपधृक् ||३४||
तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे
यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्वरम् ||३५||
सोऽहं त्वयार्चितो भद्रे ईदृग्भावेन भक्तितः
तं ते सम्पादये काममसतीनां सुदुर्लभम् ||३६||

कश्यपजी ने कहा—अनिन्द्यसुन्दरी प्रिये ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझ से माँग लो । पति के प्रसन्न हो जाने पर पत्नी के लिये लोक या परलोक में कौन-सी अभीष्ट वस्तु दुर्लभ है ॥ ३२ ॥ शास्त्रों में यह बात स्पष्ट कही गयी है कि पति ही स्त्रियों का परमाराध्य इष्टदेव है । प्रिये ! लक्ष्मीपति भगवान्‌ वासुदेव ही समस्त प्राणियों के हृदयमें विराजमान हैं ॥ ३३ ॥ विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्‌ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं ॥ ३४ ॥ इसलिये प्रिये ! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं ॥ ३५ ॥ कल्याणी ! तुमने बड़े प्रेमभावसे, भक्तिसे मेरी वैसी ही पूजा की है। अब मैं तुम्हारी सब अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। असतियोंके जीवनमें ऐसा होना अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ३६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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