॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१६)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
श्रीशुक उवाच -
संस्तुतो भगवान् एवं अनन्तस्तमभाषत ।
विद्याधरपतिं प्रीतः चित्रकेतुं कुरूद्वह ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान् उवाच -
यन्नारदाङ्गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् ।
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।
शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।
उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
यथा सुषुप्तः पुरुषो विश्वं पश्यति चात्मनि ।
आत्मानमेकदेशस्थं मन्यते स्वप्न उत्थितः ॥ ५३ ॥
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।
मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! जब विद्याधरोंके अधिपति चित्रकेतुने अनन्तभगवान्की इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान् ने कहा—चित्रकेतो ! देवर्षि नारद और महर्षि अङ्गिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५० ॥ मैं ही समस्त प्राणियोंके रूपमें हूँ, मैं ही उनका आत्मा हूँ और मैं ही पालनकर्ता भी हूँ। शब्दब्रह्म (वेद) और परब्रह्म दोनों ही मेरे सनातन रूप हैं ॥ ५१ ॥ आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं ॥ ५२ ॥ जैसे स्वप्न में सोया हुआ पुरुष स्वप्नान्तर होनेपर सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें ही देखता है और स्वप्नान्तर टूट जानेपर स्वप्नमें ही जागता है तथा अपनेको संसारके एक कोनेमें स्थित देखता है, परंतु वास्तवमें वह भी स्वप्न ही है, वैसे ही जीवकी जाग्रत् आदि अवस्थाएँ परमेश्वरकी ही माया हैं—यों जानकर सबके साक्षी मायातीत परमात्माका ही स्मरण करना चाहिये ॥ ५३-५४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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