गुरुवार, 21 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)

अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन

एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता
अस्पृष्टवार्यधौताङ्घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता ||६०||
लब्ध्वा तदन्तरं शक्रो निद्रा पहृतचेतसः
दितेः प्रविष्ट उदरं योगेशो योगमायया ||६१||
चकर्त सप्तधा गर्भं वज्रेण कनकप्रभम्
रुदन्तं सप्तधैकैकं मा रोदीरिति तान्पुनः ||६२||
तमूचुः पाट्यमानास्ते सर्वे प्राञ्जलयो नृप
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव ||६३||
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिकः
अनन्यभावान्पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ||६४||

दिति व्रत के नियमों का पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाता ने भी उसे मोह में डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्या के समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी ॥ ६० ॥ योगेश्वर इन्द्र ने देखा कि यह अच्छा अवसर हाथ लगा। वे योगबल से झटपट सोयी हुई दितिके गर्भ में प्रवेश कर गये ॥ ६१ ॥ उन्होंने वहाँ जाकर सोने के समान चमकते हुए गर्भ के वज्र के द्वारा सात टुकड़े कर दिये। जब वह गर्भ रोने लगा, तब उन्होंने ‘मत रो, मत रो’ यह कहकर सातों टुकड़ोंमेंसे एक-एक के और भी सात टुकड़े कर दिये ॥ ६२ ॥ राजन् ! जब इन्द्र उनके टुकड़े-टुकड़े करने लगे, तब उन सबों ने हाथ जोडक़र इन्द्र से कहा—‘देवराज ! तुम हमें क्यों मार रहे हो ? हम तो तुम्हारे भाई मरुद्गण हैं’ ॥ ६३ ॥ तब इन्द्रने अपने भावी अनन्यप्रेमी पार्षद मरुद्गणसे कहा—‘अच्छी बात है, तुमलोग मेरे भाई हो। अब मत डरो !’ ॥६४॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐🥀🌹ॐश्रीपरमात्मने नमः
    नारायण नारायण हरि : !! हरि: !!
    श्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः🙏

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