॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप
चित्रकेतुरुवाच -
एष लोकगुरुः साक्षात् धर्मं वक्ता शरीरिणाम् ।
आस्ते मुख्यः सभायां वै मिथुनीभूय भार्यया ॥ ६ ॥
जटाधरस्तीव्रतपा ब्रह्मवादिसभापतिः ।
अङ्कीकृत्य स्त्रियं चास्ते गतह्रीः प्राकृतो यथा ॥ ७ ॥
प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति ।
अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम् ॥ ८ ॥
श्रीशुक उवाच -
भगवानपि तच्छ्रुत्वा प्रहस्यागाधधीर्नृप ।
तूष्णीं बभूव सदसि सभ्याश्च तदनुव्रताः ॥ ९ ॥
इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम् ।
रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने ॥ १० ॥
चित्रकेतु ने कहा—अहो ! ये सारे जगत् के धर्मशिक्षक और गुरुदेव हैं। ये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं। इनकी यह दशा है कि भरी सभा में अपनी पत्नी को शरीर से चिपकाकर बैठे हुए हैं ॥ ६ ॥ जटाधारी, बहुत बड़े तपस्वी एवं ब्रह्मवादियोंके सभापति होकर भी साधारण पुरुषके समान निर्लज्जतासे गोदमें स्त्री लेकर बैठे हैं ॥ ७ ॥ प्राय: साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परंतु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् शङ्करकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान् शङ्करका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमंड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा— ॥ ९-१० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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