॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट१५)
अदिति और दिति की सन्तानों की तथा मरुद्गण की उत्पत्ति का वर्णन
इन्द्र उवाच
अम्ब तेऽहं व्यवसितमुपधार्यागतोऽन्तिकम्
लब्धान्तरोऽच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्मदृक् ||७१||
कृत्तो मे सप्तधा गर्भ आसन्सप्त कुमारकाः
तेऽपि चैकैकशो वृक्णाः सप्तधा नापि मम्रिरे ||७२||
ततस्तत्परमाश्चर्यं वीक्ष्य व्यवसितं मया
महापुरुषपूजायाः सिद्धिः काप्यानुषङ्गिणी ||७३||
आराधनं भगवत ईहमाना निराशिषः
ये तु नेच्छन्त्यपि परं ते स्वार्थकुशलाः स्मृताः ||७४||
आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्वरम्
को वृणीत गुणस्पर्शं बुधः स्यान्नरकेऽपि यत् ||७५||
तदिदं मम दौर्जन्यं बालिशस्य महीयसि
क्षन्तुमर्हसि मातस्त्वं दिष्ट्या गर्भो मृतोत्थितः ||७६||
श्रीशुक उवाच
इन्द्र स्तयाभ्यनुज्ञातः शुद्धभावेन तुष्टया
मरुद्भिः सह तां नत्वा जगाम त्रिदिवं प्रभुः || ७७||
एवं ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि
मङ्गलं मरुतां जन्म किं भूयः कथयामि ते ||७८||
इन्द्र ने कहा—माता ! मुझे इस बातका पता चल गया था कि तुम किस उद्देश्यसे व्रत कर रही हो। इसीलिये अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मैं स्वर्ग छोडक़र तुम्हारे पास आया। मेरे मनमें तनिक भी धर्म-भावना नहीं थी। इसीसे तुम्हारे व्रतमें त्रुटि होते ही मैंने उस गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ७१ ॥ पहले मैंने उसके सात टुकड़े किये थे। तब वे सातों टुकड़े सात बालक बन गये। इसके बाद मैंने फिर एक-एकके सात-सात टुकड़े कर दिये। तब भी वे न मरे, बल्कि उनचास हो गये ॥ ७२ ॥ यह परम आश्चर्यमयी घटना देखकर मैंने ऐसा निश्चय किया कि परमपुरुष भगवान् की उपासनाकी यह कोई स्वाभाविक सिद्धि है ॥ ७३ ॥ जो लोग निष्काम भावसे भगवान्की आराधना करते हैं और दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते, वे ही अपने स्वार्थ और परमार्थमें निपुण हैं ॥ ७४ ॥ भगवान् जगदीश्वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं। वे प्रसन्न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके विषयभोगोंका वरदान माँगे। माताजी ! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं ॥ ७५ ॥ मेरी स्नेहमयी जननी ! तुम सब प्रकार मेरी पूज्या हो। मैंने मूर्खतावश बड़ी दुष्टताका काम किया है। तुम मेरे अपराधको क्षमा कर दो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा गर्भ खण्ड-खण्ड हो जानेसे एक प्रकार मर जानेपर भी फिरसे जीवित हो गया ॥ ७६ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! दिति देवराज इन्द्रके शुद्धभावसे सन्तुष्ट हो गयी। उससे आज्ञा लेकर देवराज इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ उसे नमस्कार किया और स्वर्गमें चले गये ॥ ७७ ॥ राजन् ! यह मरुद्गणका जन्म बड़ा ही मङ्गलमय है। इसके विषयमें तुमने मुझसे जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर समग्ररूप से मैंने तुम्हें दे दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ७८ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मरुदुत्पत्तिकथनं नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹🪷🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः 🙏
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