॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः
स्वस्थामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुनिः ।
प्रवृद्धभक्त्या प्रणयाश्रुलोचनः
प्रहृष्टरोमानमदादिपुरुषम् ॥ ३१ ॥
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं
प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहुः ।
प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो
नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम् ॥ ३२ ॥
ततः समाधाय मनो मनीषया
बभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ ।
नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनं
जगद्गुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम् ॥ ३३ ॥
भगवान् शेष का दर्शन करते ही राजर्षि चित्रकेतु के सारे पाप नष्ट हो गये। उनका अन्त:करण स्वच्छ और निर्मल हो गया। हृदय में भक्तिभाव की बाढ़ आ गयी। नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक आये। शरीर का एक-एक रोम खिल उठा। उन्होंने ऐसी ही स्थिति में आदिपुरुष भगवान् शेषको नमस्कार किया ॥ ३१ ॥ उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू टप-टप गिरते जा रहे थे। इससे भगवान् शेषके चरण रखनेकी चौकी भीग गयी। प्रेमोद्रेकके कारण उनके मुँहसे एक अक्षर भी न निकल सका। वे बहुत देरतक शेषभगवान्की कुछ भी स्तुति न कर सके ॥ ३२ ॥ थोड़ी देर बाद उन्हें बोलनेकी कुछ-कुछ शक्ति प्राप्त हुई। उन्होंने विवेकबुद्धि से मन को समाहित किया और सम्पूर्ण इन्द्रियों की बाह्यवृत्ति को रोका। फिर उन जगद्गुरु की, जिनके स्वरूप का पाञ्चरात्र आदि भक्तिशास्त्रों में वर्णन किया गया है, इस प्रकार स्तुति की ॥ ३३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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