मंगलवार, 16 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

अवधूतोपाख्यान—पृथ्वी से लेकर कबूतर तक आठ गुरुओं की कथा

 

श्रीभगवानुवाच

प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः

समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् १९

आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः

यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते २०

पुरुषत्वे च मां धीराः साङ्ख्ययोगविशारदाः

आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम् २१

एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः

बह्व्यः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया २२

अत्र मां मृगयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम्

गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः २३

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्

अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः २४

अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतोभयम्

कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित् २५

 

श्रीयदुरुवाच

कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तुः सुविशारदा

यामासाद्य भवाँल्लोकं विद्वाँश्चरति बालवत् २६

प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः

हेतुनैव समीहन्त आयुषो यशसः श्रियः २७

त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः

न कर्ता नेहसे किञ्चिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् २८

जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना

न तप्यसेऽग्निना मुक्तो गङ्गाम्भःस्थ इव द्विपः २९

त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम्

ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ३०

 

श्रीभगवानुवाच

यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा

पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः ३१

 

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—उद्धव ! संसारमें जो मनुष्य ‘यह जगत् क्या है ? इसमें क्या हो रहा है ?’ इत्यादि बातोंका विचार करनेमें निपुण हैं, वे चित्तमें भरी हुई अशुभ वासनाओंसे अपने- आपको स्वयं अपनी विवेकशक्तिसे ही प्राय: बचा लेते हैं ॥ १९ ॥ समस्त प्राणियोंका विशेषकर मनुष्यका आत्मा अपने हित और अहितका उपदेशक गुरु है। क्योंकि मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमानके द्वारा अपने हित-अहितका निर्णय करनेमें पूर्णत: समर्थ है ॥ २० ॥ सांख्ययोगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमें इन्द्रियशक्ति, मन:शक्ति आदिके आश्रयभूत मुझ आत्मतत्त्वको पूर्णत: प्रकटरूपसे साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ २१ ॥ मैंने एक पैरवाले, दो पैरवाले, तीन पैरवाले, चार पैरवाले, चारसे अधिक पैरवाले और बिना पैरके—इत्यादि अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्यका ही शरीर है ॥ २२ ॥ इस मनुष्य-शरीरमें एकाग्रचित्त तीक्ष्णबुद्धि पुरुष बुद्धि आदि ग्रहण किये जानेवाले हेतुओंसे जिनसे कि अनुमान भी होता है, अनुमानसे अग्राह्य अर्थात् अहङ्कार आदि विषयोंसे भिन्न मुझ सर्वप्रवर्तक ईश्वरको साक्षात् अनुभव करते हैं [*] ॥ २३ ॥ इस विषयमें महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदुके संवादके रूपमें है ॥ २४ ॥ एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्न किया॥२५॥

राजा यदुने पूछा—ब्रह्मन् ! आप कर्म तो करते नहीं, फिर आपको यह अत्यन्त निपुण बुद्धि कहाँसे प्राप्त हुई ? जिसका आश्रय लेकर आप परम विद्वान् होनेपर भी बालकके समान संसारमें विचरते रहते हैं ॥ २६ ॥ ऐसा देखा जाता है कि मनुष्य आयु, यश अथवा सौन्दर्य-सम्पत्ति आदिकी अभिलाषा लेकर ही धर्म, अर्थ, काम अथवा तत्त्व-जिज्ञासामें प्रवृत्त होते हैं; अकारण कहीं किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती ॥ २७ ॥ मैं देख रहा हूँ कि आप कर्म करनेमें समर्थ, विद्वान् और निपुण हैं। आपका भाग्य और सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। आपकी वाणीसे तो मानो अमृत टपक रहा है। फिर भी आप जड़, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान रहते हैं; न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं ॥ २८ ॥ संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानल से जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्रि लगनेपर उससे छूटकर गङ्गाजल में खड़ा हो ॥ २९ ॥ ब्रह्मन् ! आप पुत्र, स्त्री, धन आदि संसारके स्पर्शसे भी रहित हैं। आप सदा-सर्वदा अपने केवल स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मामें ही ऐसे अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव कैसे होता है ? आप कृपा करके अवश्य बतलाइये ॥ ३० ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—उद्धव ! हमारे पूर्वज महाराज यदुकी बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदयमें ब्राह्मण-भक्ति थी। उन्होंने परमभाग्यवान् दत्तात्रेयजीका अत्यन्त सत्कार करके यह प्रश्र पूछा और बड़े विनम्रभावसे सिर झुकाकर वे उनके सामने खड़े हो गये। अब दत्तात्रेयजीने कहा ॥ ३१ ॥

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[*] अनुसंधानके दो प्रकार हैं (१) एक स्वप्रकाश तत्त्वके बिना बुद्धि आदि जड पदार्थोंका प्रकाश नहीं हो सकता। इस प्रकार अर्थापत्तिके द्वारा और (२) जैसे बसीला आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार यह बुद्धि आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा ही प्रयुक्त हो रहे हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आत्मा आनुमानिक है। यह तो देहादिसे विलक्षण त्वं पदार्थके शोधनकी युक्तिमात्र है।

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

 

अवधूतोपाख्यान—पृथ्वी से लेकर कबूतर तक आठ गुरुओं की कथा

 

श्रीभगवानुवाच

यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे

ब्रह्मा भवो लोकपालाः स्वर्वासं मेऽभिकाङ्क्षिणः १

मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषतः

यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थितः २

कुलं वै शापनिर्दग्धं नङ्क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्

समुद्रः! सप्तमे ह्येनां पुरीं च प्लावयिष्यति ३

यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गलः

भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृतः ४

न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले

जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ५

त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु

मय्यावेश्य मनः संयक्समदृग्विचरस्व गाम् ६

यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः

नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम् ७

पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्

कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ८

तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्

आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ९

ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम्

अत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे १०

दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते

गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथार्भकः ११

सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चयः

पश्यन्मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः १२

 

श्रीशुक उवाच

इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप

उद्धवः प्रणिपत्याह तत्त्वं जिज्ञासुरच्युतम् १३

 

श्रीउद्धव उवाच

योगेश योगविन्यास योगात्मन्योगसम्भव

निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः सन्न्यासलक्षणः १४

त्यागोऽयं दुष्करो भूमन्कामानां विषयात्मभिः

सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मतिः १५

सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढः

त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे

तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाहं

संसाधयामि भगवन्ननुशाधि भृत्यम् १६

सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं

वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे

सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे

ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः १७

तस्माद्भवन्तमनवद्यमनन्तपारं

सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्

निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो

नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये १८

 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा—महाभाग्यवान् उद्धव ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं वही करना चाहता हूँ। ब्रह्मा, शङ्कर और इन्द्रादि लोकपाल भी अब यही चाहते हैं कि मैं उनके लोकोंमें होकर अपने धामको चला जाऊँ ॥ १ ॥ पृथ्वीपर देवताओंका जितना काम करना था, उसे मैं पूरा कर चुका। इसी कामके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैं बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुआ था ॥ २ ॥ अब यह यदुवंश, जो ब्राह्मणोंके शापसे भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्धसे नष्ट हो जायगा। आजके सातवें दिन समुद्र इस पुरी-द्वारकाको डुबो देगा ॥ ३ ॥ प्यारे उद्धव ! जिस क्षण मैं मत्र्यलोकका परित्याग कर दूँगा, उसी क्षण इसके सारे मङ्गल नष्ट हो जायँगे और थोड़े ही दिनोंमें पृथ्वीपर कलियुगका बोलबाला हो जायगा ॥ ४ ॥ जब मैं इस पृथ्वीका त्याग कर दूँ, तब तुम इसपर मत रहना; क्योंकि साधु उद्धव ! कलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्ममें ही होगी ॥ ५ ॥ अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो ॥ ६ ॥ इस जगत्में जो कुछ मनसे सोचा जाता है, वाणीसे कहा जाता है, नेत्रोंसे देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियोंसे अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान् है। सपनेकी तरह मनका विलास है। इसलिये मायामात्र है, मिथ्या है—ऐसा समझ लो ॥ ७ ॥ जिस पुरुषका मन अशान्त है, असंयत है, उसीको पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ मालूम पड़ती हैं; वास्तवमें यह चित्तका भ्रम ही है। नानात्वका भ्रम हो जानेपर ही ‘यह गुण है’ और ‘यह दोष’ इस प्रकारकी कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धिमें गुण और दोषका भेद बैठ गया है, दृढ़मूल हो गया है, उसीके लिये कर्म [1] अकर्म [2] और विकर्मरूप [3] भेदका प्रतिपादन हुआ है ॥ ८ ॥ इसलिये उद्धव ! तुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथमें ले लो और केवल इन्द्रियोंको ही नहीं, चित्तकी समस्त वृत्तियोंको भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपने आत्मामें ही फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्मसे एक है, अभिन्न है ॥ ९ ॥ जब वेदोंके मुख्य तात्पर्य—निश्चयरूप ज्ञान और अनुभवरूप विज्ञानसे भलीभाँति सम्पन्न होकर तुम अपने आत्माके अनुभव में ही आनन्दमग्र रहोगे और सम्पूर्ण देवता आदि शरीरधारियोंके आत्मा हो जाओगे। इसलिये किसी भी विघ्रसे तुम पीडित नहीं हो सकोगे; क्योंकि उन विघ्नों और विघ्न करनेवालों की आत्मा भी तुम्हीं होगे ॥ १० ॥ जो पुरुष गुण और दोष-बुद्धिसे अतीत हो जाता है, वह बालक के समान निषिद्ध कर्मसे निवृत्त होता है, परन्तु दोष-बुद्धिसे नहीं। वह विहित कर्मका अनुष्ठान भी करता है, परन्तु गुणबुद्धिसे नहीं ॥ ११ ॥ जिसने श्रुतियोंके तात्पर्यका यथार्थ ज्ञान ही नहीं प्राप्त कर लिया, बल्कि उनका साक्षात्कार भी कर लिया है और इस प्रकार जो अटल निश्चयसे सम्पन्न हो गया है, वह समस्त प्राणियोंका हितैषी सुहृद् होता है और उसकी वृत्तियाँ सर्वथा शान्त रहती हैं। वह समस्त प्रतीयमान विश्वको मेरा ही स्वरूप—आत्मस्वरूप देखता है; इसलिये उसे फिर कभी जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पडऩा पड़ता ॥ १२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार आदेश दिया, तब भगवान्‌के परम प्रेमी उद्धवजीने उन्हें प्रणाम करके तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी इच्छासे यह प्रश्र किया ॥ १३ ॥

उद्धवजीने कहा—भगवन् ! आप ही समस्त योगियोंकी गुप्त पूँजी योगोंके कारण और योगेश्वर हैं। आप ही समस्त योगोंके आधार, उनके कारण और योगस्वरूप भी हैं। आपने मेरे परम- कल्याणके लिये उस संन्यासरूप त्यागका उपदेश किया है ॥ १४ ॥ परन्तु अनन्त ! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप ! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥ प्रभो ! मैं भी ऐसा ही हूँ; मेरी मति इतनी मूढ़ हो गयी है कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस भावसे मैं आपकी मायाके खेल, देह और देहके सम्बन्धी स्त्री, पुत्र, धन आदिमें डूब रहा हूँ। अत: भगवन् ! आपने जिस संन्यासका उपदेश किया है, उसका तत्त्व मुझ सेवकको इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूँ ॥ १६ ॥ मेरे प्रभो ! आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालोंसे अबाधित, एकरस सत्य हैं। आप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश आत्मस्वरूप हैं। प्रभो ! मैं समझता हूँ कि मेरे लिये आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही उपदेश कीजिये ॥ १७ ॥ भगवन् ! इसीसे चारों ओरसे दु:खोंकी दावाग्रिसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठ- लोक के निवासी एवं नर के नित्य सखा नारायण हैं। (अत: आप ही मुझे उपदेश कीजिये) ॥ १८ ॥

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[1] विहित कर्म।

[2] विहित कर्मका लोप।

[3] निषिद्ध कर्म।

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



सोमवार, 15 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— छठा अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— छठा अध्याय..(पोस्ट०२)

 

देवताओं की भगवान्‌ से स्वधाम सिधारने के लिये प्रार्थना

तथा यादवों को प्रभासक्षेत्र जाने की तैयारी करते देखकर

उद्धव का भगवान्‌ के पास आना

 

श्रीब्रह्मोवाच

भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापितः प्रभो

त्वमस्माभिरशेषात्मन्तत्तथैवोपपादितम् २१

धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसन्धेषु वै त्वया

कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा २२

अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्

कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथाः २३

यानि ते चरितानीश मनुष्याः साधवः कलौ

शृण्वन्तः कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तमः २४

यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम

शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो २५

नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्

कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम् २६

ततः स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे

सलोकाल्लोकपालान्नः पाहि वैकुण्ठकिङ्करान् २७

 

श्रीभगवानुवाच

अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर

कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः २८

तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्

लोकं जिघृक्षद्रुद्धं मे वेलयेव महार्णवः २९

यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्

गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्ष्यति ३०

इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापजः

यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ ३१

 

श्रीशुक उवाच

इत्युक्तो लोकनाथेन स्वयम्भूः प्रणिपत्य तम्

सह देवगणैर्देवः स्वधाम समपद्यत ३२

अथ तस्यां महोत्पातान्द्वारवत्यां समुत्थितान्

विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान्समागतान् ३३

 

श्रीभगवानुवाच

एते वै सुमहोत्पाता व्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः

शापश्च नः कुलस्यासीद्ब्राह्मणेभ्यो दुरत्ययः ३४

न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यकाः

प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव मा चिरम् ३५

यत्र स्नात्वा दक्षशापाद्गृहीतो यक्ष्मणोदुराट्

विमुक्तः किल्बिषात्सद्यो भेजे भूयः कलोदयम् ३६

वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितॄन्सुरान्

भोजयित्वोशिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा ३७

तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै

वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ३८

 

श्रीशुक उवाच

एवं भगवतादिष्टा यादवाः कुरुनन्दन

गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान्समयूयुजन् ३९

तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन्श्रुत्वा भगवतोदितम्

दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रतः ४०

विविक्त उपसङ्गम्य जगतामीश्वरेश्वरम्

प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत ४१

 

श्रीउद्धव उवाच

देवदेवेश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन

संहृत्यैतत्कुलं नूनं लोकं सन्त्यक्ष्यते भवान्

विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वरः ४२

नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव

त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि ४३

तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममङ्गलम्

कर्णपीयूषमासाद्य त्यजन्त्यन्यस्पृहां जनाः ४४

शय्यासनाटनस्थान स्नानक्रीडाशनादिषु

कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेम हि ४५

त्वयोपभुक्तस्रग्गन्ध वासोऽलङ्कारचर्चिताः

उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि ४६

वातरशना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः

ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः सन्न्यासिनोऽमलाः ४७

वयं त्विह महायोगिन्भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु

त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तमः ४८

स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च

गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम् ४९

 

श्रीशुक उवाच

एवं विज्ञापितो राजन्भगवान्देवकीसुतः

एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ५०

 

ब्रह्माजीने कहा—सर्वात्मन् प्रभो ! पहले हमलोगों ने आपसे अवतार लेकर पृथ्वी का भार उतारने के लिये प्रार्थना की थी। सो वह काम आपने हमारी प्रार्थना के अनुसार ही यथोचितरूप  से पूरा कर दिया ॥ २१ ॥ आपने सत्यपरायण साधुपुरुषों के कल्याणार्थ धर्म की स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओंमें ऐसी कीर्ति फैला दी, जिसे सुन-सुनाकर सब लोग अपने मनका मैल मिटा देते हैं ॥ २२ ॥ आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंशमें अवतार लिया और जगत्के हितके लिये उदारता और पराक्रमसे भरी अनेकों लीलाएँ कीं ॥ २३ ॥ प्रभो ! कलियुगमें जो साधुस्वभाव मनुष्य आपकी इन लीलाओंका श्रवण-कीर्तन करेंगे, वे सुगमतासे ही इस अज्ञानरूप अन्धकारसे पार हो जायँगे ॥ २४ ॥ पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान् प्रभो ! आपको यदुवंशमें अवतार ग्रहण किये एक सौ पचीस वर्ष बीत गये हैं ॥ २५ ॥ सर्वाधार ! अब हमलोगोंका ऐसा कोई काम बाकी नहीं है, जिसे पूर्ण करनेके लिये आपके यहाँ रहनेकी आवश्यकता हो। ब्राह्मणोंके शापके कारण आपका यह कुल भी एक प्रकारसे नष्ट हो ही चुका है ॥ २६ ॥ इसलिये वैकुण्ठनाथ ! यदि आप उचित समझें तो अपने परमधाममें पधारिये और अपने सेवक हम लोकपालोंका तथा हमारे लोकोंका पालन-पोषण कीजिये ॥ २७ ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्माजी ! आप जैसा कहते हैं, मैं पहलेसे ही वैसा निश्चय कर चुका हूँ। मैंने आपलोगोंका सब काम पूरा करके पृथ्वीका भार उतार दिया ॥ २८ ॥ परन्तु अभी एक काम बाकी है; वह यह कि यदुवंशी बल-विक्रम, वीरता-शूरता और धन-सम्पत्तिसे उन्मत्त हो रहे हैं। ये सारी पृथ्वीको ग्रस लेनेपर तुले हुए हैं। इन्हें मैंने ठीक वैसे ही रोक रखा है, जैसे समुद्रको उसके तटकी भूमि ॥ २९ ॥ यदि मैं घमंडी और उच्छृङ्खल यदुवंशियोंका यह विशाल वंश नष्ट किये बिना ही चला जाऊँगा तो ये सब मर्यादाका उल्लङ्घन करके सारे लोकोंका संहार कर डालेंगे ॥ ३० ॥ निष्पाप ब्रह्माजी ! अब ब्राह्मणोंके शापसे इस वंशका नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जानेपर मैं आपके धाममें होकर जाऊँगा ॥ ३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब अखिललोकाधिपति भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया और देवताओंके साथ वे अपने धामको चले गये ॥ ३२ ॥ उनके जाते ही द्वारकापुरीमें बड़े-बड़े अपशकुन, बड़े-बड़े उत्पात उठ खड़े हुए। उन्हें देखकर यदुवंशके बड़े-बूढ़े भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास आये। भगवान्‌ श्रीकृष्णने उनसे यह बात कही ॥ ३३ ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—गुरुजनो ! आजकल द्वारकामें जिधर देखिये, उधर ही बड़े-बड़े अपशकुन और उत्पात हो रहे हैं। आपलोग जानते ही हैं कि ब्राह्मणोंने हमारे वंशको ऐसा शाप दे दिया है, जिसे टाल सकना बहुत ही कठिन है। मेरा ऐसा विचार है कि यदि हमलोग अपने प्राणोंकी रक्षा चाहते हों तो हमें यहाँ नहीं रहना चाहिये। अब विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है। हमलोग आज ही परम पवित्र प्रभासक्षेत्रके लिये निकल पड़ें ॥ ३४-३५ ॥ प्रभासक्षेत्रकी महिमा बहुत प्रसिद्ध है। जिस समय दक्ष प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजयक्ष्मा रोगने ग्रस लिया था, उस समय उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें जाकर स्नान किया और वे तत्क्षण उस पापजन्य रोगसे छूट गये। साथ ही उन्हें कलाओंकी अभिवृद्धि भी प्राप्त हो गयी ॥ ३६ ॥ हमलोग भी प्रभासक्षेत्रमें चलकर स्नान करेंगे, देवता एवं पितरोंका तर्पण करेंगे और साथ ही अनेकों गुणवाले पकवान तैयार करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करायेंगे। वहाँ हमलोग उन सत्पात्र ब्राह्मणोंको पूरी श्रद्धासे बड़ी-बड़ी दान- दक्षिणा देंगे और इस प्रकार उनके द्वारा अपने बड़े-बड़े सङ्कटोंको वैसे ही पार कर जायँगे, जैसे कोई जहाज  के द्वारा समुद्र पार कर जाय ! ॥ ३७-३८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—कुलनन्दन ! जब भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस प्रकार आज्ञा दी, तब यदुवंशियोंने एक मतसे प्रभास जानेका निश्चय कर लिया और सब अपने-अपने रथ सजाने-जोतने लगे ॥ ३९ ॥ परीक्षित्‌ ! उद्धव जी भगवान्‌ श्रीकृष्ण के बड़े प्रेमी और सेवक थे। उन्होंने जब यदुवंशियोंको यात्राकी तैयारी करते देखा, भगवान्‌की आज्ञा सुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन देखे, तब वे जगत् के एकमात्र अधिपति भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास एकान्तमें गये, उनके चरणोंपर अपना सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोडक़र उनसे प्रार्थना करने लगे ॥ ४०-४१ ॥

उद्धवजीने कहा—योगेश्वर ! आप देवाधिदेवोंके भी अधीश्वर हैं। आपकी लीलाओंके श्रवण- कीर्तनसे जीव पवित्र हो जाता है। आप सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। आप चाहते, तो ब्राह्मणोंके शापको मिटा सकते थे। परन्तु आपने वैसा किया नहीं। इससे मैं यह समझ गया कि अब आप यदुवंशका संहार करके, इसे समेटकर अवश्य ही इस लोकका परित्याग कर देंगे ॥ ४२ ॥ परन्तु घुँघराली अलकोंवाले श्यामसुन्दर ! मैं आधे क्षणके लिये भी आपके चरणकमलोंके त्यागकी बात सोच भी नहीं सकता। मेरे जीवनसर्वस्व, मेरे स्वामी ! आप मुझे भी अपने धाममें ले चलिये ॥ ४३ ॥ प्यारे कृष्ण ! आपकी एक-एक लीला मनुष्योंके लिये परम मङ्गलमयी और कानोंके लिये अमृतस्वरूप है। जिसे एक बार उस रसका चसका लग जाता है, उसके मनमें फिर किसी दूसरी वस्तुके लिये लालसा ही नहीं रह जाती। प्रभो ! हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया; कहाँतक गिनावें, हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही। आप हमारे प्रियतम हैं; और तो क्या, आप हमारे आत्मा ही हैं। ऐसी स्थितिमें हम आपके प्रेमी भक्त आपको कैसे छोड़ सकते हैं ? ॥ ४४-४५ ॥ हमने आपकी धारण की हुई माला पहनी, आपके लगाये हुए चन्दन लगाये, आपके उतारे हुए वस्त्र पहने और आपके धारण किये हुए गहनोंसे अपने-आपको सजाते रहे। हम आपकी जूठन खानेवाले सेवक हैं। इसलिये हम आपकी मायापर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेंगे। (अत: प्रभो! हमें आपकी मायाका डर नहीं है, डर है तो केवल आपके वियोगका) ॥ ४६ ॥ हम जानते हैं कि मायाको पार कर लेना बहुत ही कठिन है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दिगम्बर रहकर और आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करके अध्यात्मविद्याके लिये अत्यन्त परिश्रम करते हैं। इस प्रकारकी कठिन साधनासे उन संन्यासियोंके हृदय निर्मल हो पाते हैं और तब कहीं वे समस्त वृत्तियोंकी शान्तिरूप नैष्कम्र्य-अवस्थामें स्थित होकर आपके ब्रह्मनामक धामको प्राप्त होते हैं ॥ ४७ ॥ महायोगेश्वर ! हमलोग तो कर्ममार्गमें ही भ्रम-भटक रहे हैं ! परन्तु इतना निश्चित है कि हम आपके भक्तजनोंके साथ आपके गुणों और लीलाओंकी चर्चा करेंगे तथा मनुष्यकी-सी लीला करते हुए आपने जो कुछ किया या कहा है, उसका स्मरण-कीर्तन करते रहेंगे। साथ ही आपकी चाल-ढाल, मुसकान-चितवन और हास-परिहासकी स्मृतिमें तल्लीन हो जायँगे। केवल इसीसे हम दुस्तर मायाको पार कर लेंगे। (इसलिये हमें मायासे पार जानेकी नहीं, आपके विरहकी चिन्ता है। आप हमें छोडिय़े नहीं, साथ ले चलिये) ॥ ४८-४९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब उद्धवजीने देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थनाकी, तब उन्होंने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धवजीसे कहा ॥ ५० ॥

 

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



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