शुक्रवार, 19 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

अवधूतोपाख्यान—कुरर से लेकर भृंगी तक सात गुरुओं की कथा

 

एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया ।

संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥

 एक एवाद्वितीयोऽभूत् आत्माधारोऽखिलाश्रयः ।

 कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ।

 सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ॥ १७ ॥

 परावराणां परम, आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ।

 केवलानुभवानन्द सन्दोहो निरुपाधिकः ॥ १८ ॥

 केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम् ।

 सङ्क्षोभयन् सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम ॥ १९ ॥

 तामाहुः त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम् ।

 यस्मिन् प्रोतम् इदं विश्वं येन संसरते पुमान् ॥ २० ॥

 यथोर्णनाभिः हृदयाद् ऊर्णां सन्तत्य वक्त्रतः ।

 तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः ॥ २१ ॥

 यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया ।

 स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत् तत्स्वरूपताम् ॥ २२ ॥

 कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः ।

 याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसन्त्यजन् ॥ २३ ॥

 एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः ।

 स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं श्रृणु मे वदतः प्रभो ॥ २४ ॥

 देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतुः

     बिभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम् ।

 तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि

     पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः ॥ २५ ॥

 जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान्

     पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षुतया वितन्वन् ।

 स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः

     सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६ ॥

 जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा

     शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।

 घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्तिः

     बह्व्यः सपत्‍न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ २७ ॥

 सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या

     वृक्षान् सरीसृप पशून् खगदंशमत्स्यान् ।

 तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ।

     ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ॥ २८ ॥

 लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसंभवान्ते

     मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।

 तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्

     निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ २९ ॥

एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि ।

 विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहङ्कृतिः ॥ ३० ॥

 न ह्येकस्मात् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम् ।

 ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥

 

 श्रीभगवानुवाच -

 इत्युक्त्वा स यदुं विप्रः तमामन्त्र्य गभीरधीः ।

 वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥ ३२ ॥

 अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः ।

 सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह ॥ ३३ ॥

 

अब मकड़ी से ली हुई शिक्षा सुनो। सबके प्रकाशक और अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ ने पूर्वकल्पमें बिना किसी अन्य सहायकके अपनी ही मायासे रचे हुए जगत् को कल्प के अन्तमें (प्रलयकाल उपस्थित होनेपर) कालशक्तिके द्वारा नष्ट कर दिया—उसे अपनेमें लीन कर लिया और सजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदसे शून्य अकेले ही शेष रह गये। वे सबके अधिष्ठान हैं, सबके आश्रय हैं; परन्तु स्वयं अपने आश्रय—अपने ही आधारसे रहते हैं, उनका कोई दूसरा आधार नहीं है। वे प्रकृति और पुरुष दोनोंके नियामक, कार्य और कारणात्मक जगत्के आदिकारण परमात्मा अपनी शक्ति कालके प्रभावसे सत्त्व-रज आदि समस्त शक्तियोंको साम्यावस्था में पहुँचा देते हैं और स्वयं कैवल्यरूप से एक और अद्वितीयरूपसे विराजमान रहते हैं। वे केवल अनुभवस्वरूप और आनन्दघन मात्र हैं। किसी भी प्रकार की उपाधि का उनसे सम्बन्ध नहीं है। वे ही प्रभु केवल अपनी शक्ति कालके द्वारा अपनी त्रिगुणमयी माया को क्षुब्ध करते हैं और उससे पहले क्रियाशक्ति- प्रधान सूत्र (महत्तत्त्व) की रचना करते हैं। यह सूत्ररूप महत्तत्त्व ही तीनों गुणोंकी पहली अभिव्यक्ति है, वही सब प्रकार की सृष्टि  का मूल कारण है। उसीमें यह सारा विश्व, सूत में ताने-बानेकी तरह ओतप्रोत है और इसीके कारण जीवको जन्म-मृत्युके चक्करमें पडऩा पड़ता है ॥ १६—२० ॥ जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुँहके द्वारा जाला फैलाती है, उसीमें विहार करती है और फिर उसे निगल जाती है, वैसे ही परमेश्वर भी इस जगत्को अपनेमेंसे उत्पन्न करते हैं, उसमें जीवरूपसे विहार करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं ॥ २१ ॥

राजन् ! मैंने भृङ्गी (बिलनी) कीड़े से यह शिक्षा ग्रहण की है कि यदि प्राणी स्नेहसे , द्वेषसे अथवा भयसे भी जान-बूझकर एकाग्ररूप से अपना मन किसीमें लगा दे तो उसे उसी वस्तुका स्वरूप प्राप्त हो जाता है ॥ २२ ॥ राजन् ! जैसे भृङ्गी एक कीड़ेको ले जाकर दीवारपर अपने रहनेकी जगह बंद कर देता है और वह कीड़ा भयसे उसीका चिन्तन करते-करते अपने पहले शरीरका त्याग किये बिना ही उसी शरीरसे तद्रूप हो जाता है [*] ॥ २३ ॥

राजन् ! इस प्रकार मैंने इतने गुरुओंसे ये शिक्षाएँ ग्रहण कीं। अब मैंने अपने शरीरसे जो कुछ सीखा है, वह तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २४ ॥ यह शरीर भी मेरा गुरु ही है; क्योंकि यह मुझे विवेक और वैराग्यकी शिक्षा देता है। मरना और जीना तो इसके साथ लगा ही रहता है। इस शरीरको पकड़ रखनेका फल यह है कि दु:ख-पर-दु:ख भोगते जाओ। यद्यपि इस शरीरसे तत्त्वविचार करनेमें सहायता मिलती है, तथापि मैं इसे अपना कभी नहीं समझता; सर्वदा यही निश्चय रखता हूँ कि एक दिन इसे सियार-कुत्ते खा जायँगे। इसीलिये मैं इससे असङ्ग होकर विचरता हूँ ॥ २५ ॥ जीव जिस शरीरका प्रिय करनेके लिये ही अनेकों प्रकारकी कामनाएँ और कर्म करता है तथा स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर, घर-द्वार और भाई-बन्धुओंका विस्तार करते हुए उनके पालन-पोषणमें लगा रहता है। बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सहकर धनसञ्चय करता है। आयुष्य पूरी होनेपर वही शरीर स्वयं तो नष्ट होता ही है, वृक्षके समान दूसरे शरीरके लिये बीज बोकर उसके लिये भी दु:ख की व्यवस्था कर जाता है ॥ २६ ॥ जैसे बहुत-सी सौतें अपने एक पति को अपनी-अपनी ओर खींचती हैं, वैसे ही जीवको जीभ एक ओर—स्वादिष्ट पदार्थोंकी ओर खींचती है तो प्यास दूसरी ओर—जलकी ओर; जननेन्द्रिय एक ओर—स्त्रीसंभोग की ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, पेट और कान दूसरी ओर—कोमल स्पर्श, भोजन और मधुर शब्दकी ओर खींचने लगते हैं। नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघनेके लिये ले जाना चाहती है तो चञ्चल नेत्र कहीं दूसरी ओर सुन्दर रूप देखनेके लिये। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों ही इसे सताती रहती हैं ॥ २७ ॥ वैसे तो भगवान्‌  ने अपनी अचिन्त्य शक्ति मायासे वृक्ष, सरीसृप (रेंगनेवाले जन्तु) पशु, पक्षी, डाँस और मछली आदि अनेकों प्रकारकी योनियाँ रचीं; परन्तु उनसे उन्हें सन्तोष न हुआ। तब उन्होंने मनुष्यशरीर  की सृष्टि की। यह ऐसी बुद्धिसे युक्त है, जो ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकती है। इसकी रचना करके वे बहुत आनन्दित हुए ॥ २८ ॥ यद्यपि यह मनुष्यशरीर है तो अनित्य ही—मृत्यु सदा इसके पीछे लगी रहती है। परन्तु इससे परमपुरुषार्थकी प्राप्ति हो सकती है; इसलिये अनेक जन्मोंके बाद यह अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्र-से- शीघ्र, मृत्युके पहले ही मोक्ष-प्राप्तिका प्रयत्न कर ले। इस जीवनका मुख्य उद्देश्य मोक्ष ही है। विषयभोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिये ॥ २९ ॥ राजन् ! यही सब सोच-विचारकर मुझे जगत् से वैराग्य हो गया। मेरे हृदयमें ज्ञान-विज्ञानकी ज्योति जगमगाती रहती है। न तो कहीं मेरी आसक्ति है और न कहीं अहङ्कार ही। अब मैं स्वच्छन्दरूपसे इस पृथ्वीमें विचरण करता हूँ ॥ ३० ॥ राजन् ! अकेले गुरुसे ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी बहुत-कुछ सोचने-समझनेकी आवश्यकता है। देखो ! ऋषियोंने एक ही अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है। (यदि तुम स्वयं विचारकर निर्णय न करोगे, तो ब्रह्मके वास्तविक स्वरूपको कैसे जान सकोगे ?) ॥ ३१ ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव ! गम्भीर-बुद्धि अवधूत दत्तात्रेयने राजा यदुको इस प्रकार उपदेश किया। यदुने उनकी पूजा और वन्दना की, दत्तात्रेयजी उनसे अनुमति लेकर बड़ी प्रसन्नता से इच्छानुसार पधार गये ॥ ३२ ॥ हमारे पूर्वजों के भी पूर्वज राजा यदु अवधूत दत्तात्रेय की यह बात सुनकर समस्त आसक्तियों से छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये। (इसी प्रकार तुम्हें भी समस्त आसक्तियों  का परित्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिये) ॥३३ ॥

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 [*] जब उसी शरीर  से चिन्तन किये रूप की प्राप्ति हो जाती है; तब दूसरे शरीरसे तो कहना ही क्या है? इसलिये मनुष्य  को अन्य वस्तु का चिन्तन न करके केवल परमात्मा  का ही चिन्तन करना चाहिये।

 

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां एकादशस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

 

 हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— नवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

 

अवधूतोपाख्यान—कुरर से लेकर भृंगी तक सात गुरुओं की कथा

 

श्रीब्राह्मण उवाच -

परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत् प्रियतमं नृणाम् ।

अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिञ्चनः ॥ १ ॥

 सामिषं कुररं जघ्नुः बलिनो ये निरामिषाः ।

 तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥ २ ॥

 न मे मानापमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम् ।

 आत्मक्रीड आत्मरतिः विचरामीह बालवत् ॥ ३ ॥

 द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ ।

 यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥ ४ ॥

 क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान् ।

 स्वयं तान् अर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५ ॥

 तेषम् अभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव ।

 अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाः चक्रुः शङ्खाः स्वनं महत् ॥ ६ ॥

 सा तत् जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता ततः ।

 बभञ्जैकैकशः शङ्खान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत् ॥ ७ ॥

 उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्म शंखयोः ।

 तत्राप्येकं निरभिदद् एकस्मात् नाभवद् ध्वनिः ॥ ८ ॥

 अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम ।

 लोकान् अनुचरन् एतान् लोकतत्त्वविवित्सया ॥ ९ ॥

 वासे बहूनां कलहो भवेत् वार्ता द्वयोरपि ।

 एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥

 मन एकत्र संयुञ्ज्यात् जितश्वासो जितासनः ।

 वैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥ ११ ॥

यस्मिन्मनो लब्धपदं यदेतत्

     शनैः शनैः मुञ्चति कर्मरेणून् ।

 सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च

     विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥

तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो

     न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा ।

 यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तं

     इषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥

एकचार्यनिकेतः स्याद् , अप्रमत्तो गुहाशयः ।

 अलक्ष्यमाण आचारैः मुनिरेकोऽल्पभाषणः ॥ १४ ॥

 गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चाध्रुवात्मनः ।

 सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १५ ॥

 

अवधूत दत्तात्रेयजीने कहा—राजन् ! मनुष्यों को जो वस्तुएँ अत्यन्त प्रिय लगती हैं, उन्हें इकट्ठा करना ही उनके दु:खका कारण है। जो बुद्धिमान् पुरुष यह बात समझकर अकिञ्चनभाव से रहता है—शरीर की तो बात ही अलग, मन से भी किसी वस्तु का संग्रह नहीं करता—उसे अनन्त सुखस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ एक कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लिये हुए था। उस समय दूसरे बलवान् पक्षी, जिनके पास मांस नहीं था, उससे छीननेके लिये उसे घेरकर चोंच मारने लगे। जब कुरर पक्षीने अपनी चोंचसे मांसका टुकड़ा फेंक दिया, तभी उसे सुख मिला ॥ २ ॥

मुझे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है और घर एवं परिवारवालों को जो चिन्ता होती है, वह मुझे नहीं है। मैं अपने आत्मा में ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीडा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालकसे ली है। अत: उसीके समान मैं भी मौजसे रहता हूँ ॥ ३ ॥ इस जगत्में दो ही प्रकारके व्यक्ति निश्चिन्त और परमानन्दमें मग्र रहते हैं—एक तो भोलाभाला निश्चेष्ट नन्हा-सा बालक और दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया हो ॥ ४ ॥

एक बार किसी कुमारी कन्याके घर उसे वरण करनेके लिये कई लोग आये हुए थे। उस दिन उसके घरके लोग कहीं बाहर गये हुए थे। इसलिये उसने स्वयं ही उनका आतिथ्यसत्कार किया ॥ ५ ॥ राजन् ! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी। उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूडिय़ाँ जोर-जोरसे बज रही थीं ॥ ६ ॥ इस शब्दको निन्दित समझकर कुमारीको बड़ी लज्जा मालूम हुई [*] और उसने एक-एक करके सब चूडिय़ाँ तोड़ डाली और दोनों हाथोंमें केवल दो-दो चूडिय़ाँ रहने दीं ॥ ७ ॥ अब वह फिर धान कूटने लगी। परन्तु वे दो-दो चूडिय़ाँ भी बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी, तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई ॥ ८ ॥ रिपुदमन ! उस समय लोगोंका आचार-विचार निरखने-परखनेके लिये इधर-उधर घूमता-घामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था। मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि जब बहुत लोग एक साथ रहते हैं तब कलह होता है और दो आदमी साथ रहते हैं तब भी बातचीत तो होती ही है; इसलिये कुमारी कन्याकी चूड़ीके समान अकेले ही विचरना चाहिये ॥ ९-१० ॥

राजन् ! मैंने बाण बनानेवालेसे यह सीखा है कि आसन और श्वासको जीतकर वैराग्य और अभ्यासके द्वारा अपने मनको वशमें कर ले और फिर बड़ी सावधानीके साथ उसे एक लक्ष्यमें लगा दे ॥ ११ ॥ जब परमानन्दस्वरूप परमात्मामें मन स्थिर हो जाता है, तब वह धीरे-धीरे कर्मवासनाओंकी धूलको धो बहाता है। सत्त्वगुणकी वृद्धिसे रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंका त्याग करके मन वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे र्ईंधनके बिना अग्रि ॥ १२ ॥ इस प्रकार जिसका चित्त अपने आत्मामें ही स्थिर—निरुद्ध हो जाता है, उसे बाहर-भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता। मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसे पतातक न चला ॥ १३ ॥

राजन् ! मैंने साँपसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासीको सर्पकी भाँति अकेले ही विचरण करना चाहिये, उसे मण्डली नहीं बाँधनी चाहिये, मठ तो बनाना ही नहीं चाहिये। वह एक स्थानमें न रहे, प्रमाद न करे, गुहा आदिमें पड़ा रहे, बाहरी आचारोंसे पहचाना न जाय। किसीसे सहायता न ले और बहुत कम बोले ॥ १४ ॥ इस अनित्य शरीरके लिये घर बनानेके बखेड़ेमें पडऩा व्यर्थ और दु:खकी जड़ है। साँप दूसरोंके बनाये घरमें घुसकर बड़े आरामसे अपना समय काटता है ॥ १५ ॥

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[*] क्योंकि उससे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था, जो कि उसकी दरिद्रता का द्योतक था।

 

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गुरुवार, 18 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

अवधूतोपाख्यान—अजगर से लेकर पिङ्गला तक नौ गुरुओं की कथा

 

पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा ।

तस्या मे शिक्षितं किञ्चित् निबोध नृपनन्दन ॥ २२ ॥

सा स्वैरिण्येकदा कान्तं सङ्केत उपनेष्यती ।

अभूत्काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २३ ॥

मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ ।

 तान् शुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका ॥ २४ ॥

 आगतेष्वपयातेषु सा सङ्केतोपजीविनी ।

 अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः ॥ २५ ॥

 एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती ।

 निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥ २६ ॥

 तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः ।

 निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः ॥ २७ ॥

 तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं श्रृणु यथा मम ।

 निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः ॥ २८ ॥

 न ह्यङ्गाज्जातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति ।

 यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप ॥ २९ ॥

 

पिङ्गलोवाच -

अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः ।

या कान्ताद् असतः कामं कामये येन बालिशा ॥ ३० ॥

सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं

     वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय ।

 अकामदं दुःखभयाधिशोक-

     मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा ॥ ३१ ॥

 अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा

     साङ्केत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया ।

 स्त्रैणान्नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात्

     क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥ ३२ ॥

 यदस्थिभिर्निर्मित-वंशवंश्य-

     स्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम् ।

 क्षरन्नवद्वारमगारमेतद् ।

     विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ॥ ३३ ॥

विदेहानां पुरे ह्यस्मिन् अहमेकैव मूढधीः ।

 यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्माद् आत्मदात् काममच्युतात् ॥ ३४ ॥

 सुहृत्प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।

 तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३५ ॥

 कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः ।

 आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः ॥ ३६ ॥

 नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा ।

 निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः ॥ ३७ ॥

 मैवं स्युः मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः ।

 येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति ॥ ३८ ॥

 तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसङ्गताः ।

 त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम् ॥ ३९ ॥

 सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद् यथालाभेन जीवती ।

 विहरामिमुनैवाहमात्मना रमणेन वै ॥ ४० ॥

 संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम् ।

 ग्रस्तं कालाहिनात्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः ॥ ४१ ॥

 आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात् ।

 अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत् ॥ ४२ ॥

 

 श्रीब्राह्मण उवाच -

 एवं व्यवसितमतिः दुराशां कान्ततर्षजाम् ।

 छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा ॥ ४३ ॥

 आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् ।

 यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥ ४४ ॥

 

नृपनन्दन ! प्राचीन कालकी बात है, विदेहनगरी मिथिलामें एक वेश्या रहती थी। उसका नाम था पिङ्गला। मैंने उससे जो कुछ शिक्षा ग्रहण की, वह मैं तुम्हे सुनाता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥ २२ ॥ वह स्वेच्छाचारिणी तो थी ही, रूपवती भी थी। एक दिन रात्रिके समय किसी पुरुषको अपने रमणस्थानमें लानेके लिये खूब बन-ठनकर—उत्तम वस्त्राभूषणोंसे सजकर बहुत देरतक अपने घरके बाहरी दरवाजेपर खड़ी रही ॥ २३ ॥ नररत्न ! उसे पुरुषकी नहीं, धनकी कामना थी और उसके मनमें यह कामना इतनी दृढ़मूल हो गयी थी कि वह किसी भी पुरुषको उधरसे आते- जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करनेके लिये ही आ रहा है ॥ २४ ॥ जब आने-जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह सङ्केतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत-सा धन देगा ॥ २५ ॥ उसके चित्तकी यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी। वह दरवाजेपर बहुत देरतक टँगी रही। उसकी नींद भी जाती रही। वह कभी बाहर आती, तो कभी भीतर जाती। इस प्रकार आधी रात हो गयी ॥ २६ ॥ राजन् ! सचमुच आशा और सो भी धनकी—बहुत बुरी है। धनीकी बाट जोहते- जोहते उसका मुँह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अब उसे इस वृत्तिसे बड़ा वैराग्य हुआ। उसमें दु:ख-बुद्धि हो गयी। इसमें सन्देह नहीं कि इस वैराग्यका कारण चिन्ता ही थी। परन्तु ऐसा वैराग्य भी है तो सुखका ही हेतु ॥ २७ ॥ जब पिङ्गलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया। वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। राजन् ! मनुष्य आशाकी फाँसीपर लटक रहा है। इसको तलवारकी तरह काटनेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है ॥ २८ ॥ प्रिय राजन् ! जिसे वैराग्य नहीं हुआ है, जो इन बखेड़ोंसे ऊबा नहीं है, वह शरीर और इसके बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोडऩेकी इच्छा भी नहीं करता ॥ २९ ॥

पिङ्गलाने यह गीत गाया था—हाय ! हाय ! मैं इन्द्रियोंके अधीन हो गयी ! भला ! मेरे मोहका विस्तार तो देखो, मैं इन दुष्ट पुरुषोंसे, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, विषयसुखकी लालसा करती हूँ। कितने दु:खकी बात है ! मैं सचमुच मूर्ख हूँ ॥ ३० ॥ देखो तो सही, मेरे निकट-से-निकट हृदयमें ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान्‌ विराजमान हैं। वे वास्तविक प्रेम, सुख और परमार्थका सच्चा धन भी देनेवाले हैं। जगत्के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं। हाय ! हाय ! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुच्छ मनुष्योंका सेवन किया, जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उलटे दु:ख-भय, आधि-व्याधि, शोक और मोह ही देते हैं। यह मेरी मूर्खताकी हद है कि मैं उनका सेवन करती हूँ ॥ ३१ ॥ बड़े खेदकी बात है, मैंने अत्यन्त निन्दनीय आजीविका वेश्यावृत्तिका आश्रय लिया और व्यर्थमें अपने शरीर और मनको क्लेश दिया, पीड़ा पहुँचायी। मेरा यह शरीर बिक गया है। लम्पट, लोभी और निन्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और मैं इतनी मूर्ख हूँ कि इसी शरीरसे धन और रति-सुख चाहती हूँ। मुझे धिक्कार है ! ॥ ३२ ॥ यह शरीर एक घर है। इसमें हड्डियोंके टेढ़े-तिरछे बाँस और खंभे लगे हुए हैं; चाम, रोएँ और नाखूनोंसे यह छाया गया है। इसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे मल निकलते ही रहते हैं। इसमें सञ्चित सम्पत्तिके नामपर केवल मल और मूत्र है। मेरे अतिरिक्त ऐसी कौन स्त्री है, जो इस स्थूलशरीरको अपना प्रिय समझकर सेवन करेगी ॥ ३३ ॥ यों तो यह विदेहोंकी—जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें मैं ही सबसे मूर्ख और दुष्ट हूँ; क्योंकि अकेली मैं ही तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमात्माको छोडक़र दूसरे पुरुषकी अभिलाषा करती हूँ ॥ ३४ ॥ मेरे हृदयमें विराजमान प्रभु, समस्त प्राणियोंके हितैषी, सुहृद्, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं। अब मैं अपने-आपको देकर इन्हें खरीद लूँगी और इनके साथ वैसे ही विहार करूँगी, जैसे लक्ष्मीजी करती हैं ॥ ३५ ॥ मेरे मूर्ख चित्त ! तू बतला तो सही, जगत् के विषयभोगोंने और उनको देनेवाले पुरुषोंने तुझे कितना सुख दिया है। अरे ! वे तो स्वयं ही पैदा होते और मरते रहते हैं। मैं केवल अपनी ही बात नहीं कहती, केवल मनुष्योंकी भी नहीं; क्या देवताओंने भी भोगोंके द्वारा अपनी पत्नियोंको सन्तुष्ट किया है ? वे बेचारे तो स्वयं कालके गालमें पड़े-पड़े कराह रहे हैं ॥ ३६ ॥ अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्मसे विष्णुभगवान्‌ मुझपर प्रसन्न हैं, तभी तो दुराशासे मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है। अवश्य ही मेरा यह वैराग्य सुख देनेवाला होगा ॥ ३७ ॥ यदि मैं मन्दभागिनी होती तो मुझे ऐसे दु:ख ही न उठाने पड़ते, जिनसे वैराग्य होता है। मनुष्य वैराग्यके द्वारा ही घर आदिके सब बन्धनोंको काटकर शान्तिलाभ करता है ॥ ३८ ॥ अब मैं भगवान्‌का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोडक़र उन्हीं जगदीश्वरकी शरण ग्रहण करती हूँ ॥ ३९ ॥ अब मुझे प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जायगा, उसीसे निर्वाह कर लूँगी और बड़े सन्तोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी। मैं अब किसी दूसरे पुरुषकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्वर, आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी ॥ ४० ॥ यह जीव संसारके कूएँमें गिरा हुआ है। विषयोंने इसे अंधा बना दिया है, कालरूपी अजगरने इसे अपने मुँहमें दबा रखा है। अब भगवान्‌को छोडक़र इसकी रक्षा करनेमें दूसरा कौन समर्थ है ॥ ४१ ॥ जिस समय जीव समस्त विषयोंसे विरक्त हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपनी रक्षा कर लेता है। इसलिये बड़ी सावधानीके साथ यह देखते रहना चाहिये कि सारा जगत् कालरूपी अजगरसे ग्रस्त है ॥ ४२ ॥

अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन् ! पिङ्गला वेश्याने ऐसा निश्चय करके अपने प्रिय धनियों  की दुराशा, उनसे मिलनेकी लालसाका परित्याग कर दिया और शान्तभावसे जाकर वह अपनी सेज पर सो रही ॥ ४३ ॥ सचमुच आशा ही सबसे बड़ा दु:ख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है; क्योंकि पिङ्गला वेश्या ने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी ॥ ४४ ॥

 

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां

संहितायां एकादशस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से 



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