सोमवार, 22 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

सत्सङ्ग की महिमा और कर्म तथा कर्मत्याग की विधि

 

श्रीउद्धव उवाच

संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर

न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः १६

 

श्रीभगवानुवाच

स एष जीवो विवरप्रसूतिः

प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः

मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं

मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठः १७

यथानलः खेऽनिलबन्धुरुष्मा

बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः

अणुः प्रजातो हविषा समेधते

तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी १८

एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो

घ्राणो रसो दृक्स्पर्शः श्रुतिश्च

सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमानः

सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः १९

अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि-

रव्यक्त एको वयसा स आद्यः

विश्लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति

बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् २०

यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं

पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः

य एष संसारतरुः पुराणः

कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते २१

द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः

पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः

दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड-

स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः २२

अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा

ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः

हंसा य एकं बहुरूपमिज्यैर्मा-

यामयं वेद स वेद वेदम् २३

एवं गुरूपासनयैकभक्त्या

विद्याकुठारेण शितेन धीरः

विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः

सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् २४

 

उद्धवजीने कहा—सनकादि योगेश्वरोंके भी परमेश्वर प्रभो ! यों तो मैं आपका उपदेश सुन रहा हूँ, परन्तु इससे मेरे मनका सन्देह मिट नहीं रहा है। मुझे स्वधर्मका पालन करना चाहिये या सब कुछ छोडक़र आपकी शरण ग्रहण करनी चाहिये, मेरा मन इसी दुविधामें लटक रहा है। आप कृपा करके मुझे भली-भाँति समझाइये ॥ १६ ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव ! जिस परमात्माका परोक्षरूपसे वर्णन किया जाता है, वे साक्षात् अपरोक्ष—प्रत्यक्ष ही हैं, क्योंकि वे ही निखिल वस्तुओंको सत्ता-स्फूर्ति—जीवन-दान करनेवाले हैं, वे ही पहले अनाहत नादस्वरूप परा वाणी नामक प्राणके साथ मूलाधारचक्रमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद मणिपूरकचक्र (नाभिस्थान) में आकर पश्यन्ती वाणीका मनोमय सूक्ष्मरूप धारण करते हैं। तदनन्तर कण्ठदेशमें स्थित विशुद्ध नामक चक्रमें आते हैं और वहाँ मध्यमा वाणीके रूपमें व्यक्त होते हैं। फिर क्रमश: मुखमें आकर ह्रस्व-दीर्घादि मात्रा, उदात्त-अनुदात्त आदि स्वर तथा ककारादि वर्णरूप स्थूल—वैखरी वाणीका रूप ग्रहण कर लेते हैं ॥ १७ ॥ अग्रि आकाशमें ऊष्मा अथवा विद्युत्के रूपसे अव्यक्तरूपमें स्थित है। जब बलपूर्वक काष्ठमन्थन किया जाता है, तब वायुकी सहायतासे वह पहले अत्यन्त सूक्ष्म चिनगारीके रूपमें प्रकट होती है और फिर आहुति देनेपर प्रचण्ड रूप धारण कर लेती है, वैसे ही मैं भी शब्दब्रह्मस्वरूपसे क्रमश: परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट होता हूँ ॥ १८ ॥ इसी प्रकार बोलना, हाथोंसे काम करना, पैरोंसे चलना, मूत्रेन्द्रिय तथा गुदासे मल-मूत्र त्यागना, सूँघना, चखना, देखना, छूना, सुनना, मनसे संकल्प- विकल्प करना, बुद्धिसे समझना, अहङ्कारके द्वारा अभिमान करना, महत्तत्त्वके रूपमें सबका ताना- बाना बुनना तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके सारे विकार कहाँतक कहूँ—समस्त कर्ता, कारण और कर्म मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं ॥ १९ ॥ यह सबको जीवित करनेवाला परमेश्वर ही इस त्रिगुणमय ब्रह्माण्ड-कमलका कारण है। यह आदि-पुरुष पहले एक और अव्यक्त था। जैसे उपजाऊ खेतमें बोया हुआ बीज शाखा-पत्र-पुष्पादि अनेक रूप धारण कर लेता है, वैसे ही कालगतिसे मायाका आश्रय लेकर शक्ति-विभाजनके द्वारा परमेश्वर ही अनेक रूपोंमें प्रतीत होने लगता है ॥ २० ॥ जैसे तागोंके ताने-बानेमें वस्त्र ओतप्रोत रहता है, वैसे ही यह सारा विश्व परमात्मामें ही ओतप्रोत है। जैसे सूतके बिना वस्त्रका अस्तित्व नहीं है; किन्तु सूत वस्त्रके बिना भी रह सकता है, वैसे ही इस जगत्के न रहनेपर भी परमात्मा रहता है; किन्तु यह जगत् परमात्मस्वरूप ही है— परमात्माके बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है। यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहरूपसे नित्य है। इसका स्वरूप ही है—कर्मकी परम्परा तथा इस वृक्षके फल-फूल हैं—मोक्ष और भोग ॥ २१ ॥ इस संसारवृक्षके दो बीज हैं—पाप और पुण्य। असंख्य वासनाएँ जड़ें हैं और तीन गुण तने हैं। पाँच भूत इसकी मोटी-मोटी प्रधान शाखाएँ हैं और शब्दादि पाँच विषय रस हैं, ग्यारह इन्द्रियाँ शाखा हैं तथा जीव और ईश्वर—दो पक्षी इसमें घोंसला बनाकर निवास करते हैं। इस वृक्षमें वात, पित्त और कफरूप तीन तरहकी छाल है। इसमें दो तरहके फल लगते हैं—सुख और दु:ख। यह विशाल वृक्ष सूर्यमण्डलतक फैला हुआ है (इस सूर्यमण्डलका भेदन कर जानेवाले मुक्त पुरुष फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ते) ॥ २२ ॥ जो गृहस्थ शब्द-रूप-रस आदि विषयोंमें फँसे हुए हैं, वे कामनासे भरे हुए होनेके कारण गीधके समान हैं। वे इस वृक्षका दु:खरूप फल भोगते हैं, क्योंकि वे अनेक प्रकारके कर्मोंके बन्धनमें फँसे रहते हैं। जो अरण्यवासी परमहंस विषयोंसे विरक्त हैं, वे इस वृक्षमें राजहंसके समान हैं और वे इसका सुखरूप फल भोगते हैं। प्रिय उद्धव ! वास्तवमें मैं एक ही हूँ। यह मेरा जो अनेकों प्रकारका रूप है, वह तो केवल मायामय है। जो इस बातको गुरुओंके द्वारा समझ लेता है, वही वास्तवमें समस्त वेदोंका रहस्य जानता है ॥ २३ ॥ अत: उद्धव ! तुम इस प्रकार गुरुदेवकी उपासनारूप अनन्य भक्तिके द्वारा अपने ज्ञानकी कुल्हाड़ीको तीखी कर लो और उसके द्वारा धैर्य एवं सावधानीसे जीवभावको काट डालो। फिर परमात्मस्वरूप होकर उस वृत्तिरूप अस्त्रोंको भी छोड़ दो और अपने अखण्ड स्वरूपमें ही स्थित हो रहो ॥ २४ ॥ [*]

 

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे

द्वादशोऽध्यायः

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

 



श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

 

सत्सङ्ग की महिमा और कर्म तथा कर्मत्याग की विधि

 

श्रीभगवानुवाच

न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा १

व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः

यथावरुन्धे सत्सङ्गः सर्वसङ्गापहो हि माम् २

सत्सङ्गेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः

गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ३

विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः

रजस्तमःप्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन्युगे युगे ४

बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः

वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः ५

सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः

व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे ६

ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः

अव्रतातप्ततपसः मत्सङ्गान्मामुपागताः ७

केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः

येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ८

यं न योगेन साङ्ख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः

व्याख्यास्वाध्यायसन्न्यासैः प्राप्नुयाद्यत्नवानपि ९

रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते

श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः

विगाढभावेन न मे वियोग

तीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय १०

तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता

मयैव वृन्दावनगोचरेण

क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां

हीना मया कल्पसमा बभूवुः ११

ता नाविदन्मय्यनुषङ्गबद्ध

धियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्

यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये

नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे १२

मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः

ब्रह्म मां परमं प्रापुः सङ्गाच्छतसहस्रशः १३

तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम्

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च १४

मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्

याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः १५

 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव ! जगत्में जितनी आसक्तियाँ हैं, उन्हें सत्सङ्ग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्सङ्ग जिस प्रकार मुझे वशमें कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य, न धर्मपालन और न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग, इष्टापूत्र्त और दक्षिणासे भी मैं वैसा प्रसन्न नहीं होता। कहाँतक कहूँ—व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम-नियम भी सत्सङ्गके समान मुझे वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १-२ ॥ निष्पाप उद्धवजी ! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्सङ्ग  के द्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गुह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है। मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ, यज्ञपत्नियाँ और दूसरे लोग भी सत्सङ्गके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं ॥ ३—६ ॥ उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना की थी। इसी प्रकार उन्होंने कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्सङ्गके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये ॥ ७ ॥ गोपियाँ, गायें, यमलार्जुन आदि वृक्ष, व्रजके हरिन आदि पशु, कालिय आदि नाग—ये तो साधन-साध्यके सम्बन्धमें सर्वथा ही मूढ़बुद्धि थे। इतने ही नहीं, ऐसे-ऐसे और भी बहुत हो गये हैं, जिन्होंने केवल प्रेमपूर्ण भावके द्वारा ही अनायास मेरी प्राप्ति कर ली और कृतकृत्य हो गये ॥ ८ ॥ उद्धव ! बड़े-बड़े प्रयत्नशील साधक योग, सांख्य, दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रुतियोंकी व्याख्या, स्वाध्याय और संन्यास आदि साधनोंके द्वारा मुझे नहीं प्राप्त कर सकते; परन्तु सत्सङ्गके द्वारा तो मैं अत्यन्त सुलभ हो जाता हूँ ॥ ९ ॥ उद्धव ! जिस समय अक्रूरजी भैया बलरामजीके साथ मुझे व्रजसे मथुरा ले आये, उस समय गोपियोंका हृदय गाढ़ प्रेमके कारण मेरे अनुरागके रंगमें रँगा हुआ था। मेरे वियोगकी तीव्र व्याधिसे वे व्याकुल हो रही थीं और मेरे अतिरिक्त कोई भी दूसरी वस्तु उन्हें सुखकारक नहीं जान पड़ती थी ॥ १० ॥ तुम जानते हो कि मैं ही उनका एकमात्र प्रियतम हूँ। जब मैं वृन्दावनमें था, तब उन्होंने बहुत-सी रात्रियाँ—वे रासकी रात्रियाँ मेरे साथ आधे क्षणके समान बिता दी थीं; परन्तु प्यारे उद्धव ! मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये एक-एक कल्पके समान हो गयीं ॥ ११ ॥ जैसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि समाधिमें स्थित होकर तथा गङ्गा आदि बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही वे गोपियाँ परम प्रेमके द्वारा मुझमें इतनी तन्मय हो गयी थीं कि उन्हें लोक-परलोक, शरीर और अपने कहलानेवाले पति-पुत्रादिकी भी सुध-बुध नहीं रह गयी थी ॥ १२ ॥ उद्धव ! उन गोपियोंमें बहुत-सी तो ऐसी थीं, जो मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानती थीं। वे मुझे भगवान्‌ न जानकर केवल प्रियतम ही समझती थीं और जारभावसे मुझसे मिलनेकी आकांक्षा किया करती थीं। उन साधनहीन सैकड़ों, हजारों अबलाओंने केवल सङ्गके प्रभावसे ही मुझ परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया ॥ १३ ॥ इसलिये उद्धव ! तुम श्रुति-स्मृति, विधि-निषेध, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सुननेयोग्य तथा सुने हुए विषयका भी परित्याग करके सर्वत्र मेरी ही भावना करते हुए समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप मुझ एककी ही शरण सम्पूर्ण रूपसे ग्रहण करो; क्योंकि मेरी शरणमें आ जानेसे तुम सर्वथा निर्भय हो जाओगे ॥ १४-१५ ॥

 

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रविवार, 21 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

बद्ध, मुक्त और भक्तजनों  के लक्षण

 

श्रीउद्धव उवाच

साधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो

भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भिरादृता २६

एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो

प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् २७

त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः

अवतीर्णोऽसि भगवन्स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः २८

 

श्रीभगवानुवाच

कृपालुरकृतद्रो हस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्

सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः २९

कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः

अनीहो मितभुक्शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ३०

अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुणः

अमानी मानदः कल्यो मैत्रः कारुणिकः कविः ३१

आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्

धर्मान्सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत स तु सत्तमः ३२

ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान्यश्चास्मि यादृशः

भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ३३

मल्लिङ्गमद्भक्तजन दर्शनस्पर्शनार्चनम्

परिचर्या स्तुतिः प्रह्व गुणकर्मानुकीर्तनम् ३४

मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव

सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम् ३५

मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वानुमोदनम्

गीतताण्डववादित्र गोष्ठीभिर्मद्गृहोत्सवः ३६

यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु

वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम् ३७

ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः

उद्यानोपवनाक्रीड पुरमन्दिरकर्मणि ३८

सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः

गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद्यदमायया ३९

अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्

अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्निवेदितम् ४०

यद्यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः

तत्तन्निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते ४१

सूर्योऽग्निर्ब्राह्मणा गावो वैष्णवः खं मरुज्जलम्

भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे ४२

सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत माम्

आतिथ्येन तु विप्राग्र्ये गोष्वङ्ग यवसादिना ४३

वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया

वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरःसरैः ४४

स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि

क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ४५

धिष्ण्येष्वित्येषु मद्रूपं शङ्खचक्रगदाम्बुजैः

युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्नर्चेत्समाहितः ४६

इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः

लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया ४७

प्रायेण भक्तियोगेन सत्सङ्गेन विनोद्धव

नोपायो विद्यते सम्यक्प्रायणं हि सतामहम् ४८

अथैतत्परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन

सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत्सखा ४९

 

उद्धवजीने पूछा—भगवन् ! बड़े-बड़े संत आपकी कीर्ति का गान करते हैं। आप कृपया बतलाइये कि आपके विचार से संत पुरुषका क्या लक्षण है ? आपके प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संतलोग आदर करते हैं ? ॥ २६ ॥ भगवन् ! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत् के स्वामी हैं। मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त हूँ। आप मुझे भक्ति और भक्तका रहस्य बतलाइये ॥ २७ ॥ भगवन् ! मैं जानता हूँ कि आप प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं। आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है; फिर भी आपने लीलाके लिये स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है। इसलिये वास्तवमें आप ही भक्ति और भक्तका रहस्य बतला सकते हैं ॥ २८ ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव ! मेरा भक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसी भी प्राणीसे वैरभाव नहीं रखता और घोर-से-घोर दु:ख भी प्रसन्नतापूर्वक सहता है। उसके जीवनका सार है सत्य, और उसके मनमें किसी प्रकारकी पापवासना कभी नहीं आती। वह समदर्शी और सबका भला करनेवाला होता है ॥ २९ ॥ उसकी बुद्धि कामनाओंसे कलुषित नहीं होती। वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। संग्रह-परिग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। किसी भी वस्तुके लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता। परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है। उसकी बुद्धि स्थिर होती है। उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्वके चिन्तनमें सदा संलग्र रहता है ॥ ३० ॥ वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह स्वयं तो कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरोंका सम्मान करता रहता है। मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है और सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है। उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है ॥ ३१ ॥ प्रिय उद्धव ! मैंने वेदों और शास्त्रोंके रूपमें मनुष्योंके धर्मका उपदेश किया है, उनके पालनसे अन्त:करणशुद्धि आदि गुण और उल्लङ्घनसे नरकादि दु:ख प्राप्त होते हैं; परन्तु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदिमें विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरे ही भजनमें लगा रहता है, वह परम संत है ॥ ३२ ॥ मैं कौन हूँ, कितना बड़ा हूँ, कैसा हूँ—इन बातोंको जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरे विचारसे मेरे परम भक्त हैं ॥ ३३ ॥

प्यारे उद्धव ! मेरी मूर्ति और मेरे भक्तजनोंका दर्शन, स्पर्श, पूजा, सेवा-शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे तथा मेरे गुण और कर्मोंका कीर्तन करे ॥ ३४ ॥ उद्धव ! मेरी कथा सुननेमें श्रद्धा रखे और निरन्तर मेरा ध्यान करता रहे। जो कुछ मिले, वह मुझे समर्पित कर दे और दास्यभावसे मुझे आत्मनिवेदन करे ॥ ३५ ॥ मेरे दिव्य जन्म और कर्मोंकी चर्चा करे। जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्वोंपर आनन्द मनावे और संगीत, नृत्य, बाजे और समाजोंद्वारा मेरे मन्दिरोंमें उत्सव करे- करावे ॥ ३६ ॥ वार्षिक त्यौहारोंके दिन मेरे स्थानोंकी यात्रा करे, जुलूस निकाले तथा विविध उपहारोंसे मेरी पूजा करे। वैदिक अथवा तान्ङ्क्षत्रक पद्धतिसे दीक्षा ग्रहण करे। मेरे व्रतोंका पालन करे ॥ ३७ ॥ मन्दिरोंमें मेरी मूर्तियोंकी स्थापनामें श्रद्धा रखे। यदि यह काम अकेला न कर सके, तो औरोंके साथ मिलकर उद्योग करे। मेरे लिये पुष्पवाटिका, बगीचे, क्रीड़ाके स्थान, नगर और मन्दिर बनवावे ॥ ३८ ॥ सेवककी भाँति श्रद्धाभक्तिके साथ निष्कपट भावसे मेरे मन्दिरोंकी सेवा- शुश्रूषा करे—झाड़े-बुहारे, लीपे-पोते, छिडक़ाव करे और तरह-तरहके चौक पूरे ॥ ३९ ॥ अभिमान न करे, दम्भ न करे। साथ ही अपने शुभ कर्मोंका ङ्क्षढढोरा भी न पीटे। प्रिय उद्धव ! मेरे चढ़ावेकी, अपने काममें लगानेकी बात तो दूर रही, मुझे समर्पित दीपकके प्रकाशसे भी अपना काम न ले। किसी दूसरे देवताकी चढ़ायी हुई वस्तु मुझे न चढ़ावे ॥ ४० ॥ संसारमें जो वस्तु अपनेको सबसे प्रिय, सबसे अभीष्ट जान पड़े वह मुझे समर्पित कर दे। ऐसा करनेसे वह वस्तु अनन्त फल देनेवाली हो जाती है ॥ ४१ ॥

भद्र ! सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी—ये सब मेरी पूजाके स्थान हैं ॥ ४२ ॥ प्यारे उद्धव ! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रों- द्वारा सूर्यमें मेरी पूजा करनी चाहिये। हवनके द्वारा अग्रिमें, आतिथ्यद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणमें और हरी-हरी घास आदिके द्वारा गौमें मेरी पूजा करे ॥ ४३ ॥ भाई-बन्धुके समान सत्कारके द्वारा वैष्णवमें, निरन्तर ध्यानमें लगे रहनेसे हृदयाकाशमें, मुख्य प्राण समझनेसे वायुमें और जल-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जलमें मेरी आराधना की जाती है ॥ ४४ ॥ गुप्त मन्त्रोंद्वारा न्यास करके मिट्टीकी वेदीमें, उपयुक्त भोगोंद्वारा आत्मामें और समदृष्टिद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरी आराधना करनी चाहिये, क्योंकि मैं सभीमें क्षेत्रज्ञ आत्माके रूपसे स्थित हूँ ॥ ४५ ॥ इन सभी स्थानोंमें शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये चार भुजाओंवाले शान्तमूर्ति श्रीभगवान्‌ विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करते हुए एकाग्रताके साथ मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे यज्ञ-यागादि इष्ट और कुआँ-बावली बनवाना आदि पूर्तकर्मोंके द्वारा मेरी पूजा करता है, उसे मेरी श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है तथा संत-पुरुषोंकी सेवा करनेसे मेरे स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है ॥ ४७ ॥ प्यारे उद्धव ! मेरा ऐसा निश्चय है कि सत्सङ्ग और भक्तियोग—इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये। प्राय: इन दोनोंके अतिरिक्त संसारसागरसे पार होनेका और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि संतपुरुष मुझे अपना आश्रय मानते हैं और मैं सदा-सर्वदा उनके पास बना रहता हूँ ॥ ४८ ॥ प्यारे उद्धव ! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय परम रहस्यकी बात बतलाऊँगा; क्योंकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, सुहृद् और प्रेमी सखा हो; साथ ही सुननेके भी इच्छुक हो ॥ ४९ ॥

 

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे

एकादशोऽध्यायः

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण नभो गतो दिशः सर्वाः सह...