रविवार, 12 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

श्रीशुक उवाच - 

ते एवं शंसतो धर्मं वचः पत्युरचेतसः । 
नैवागृह्णन् भयत्रस्ताः पलायनपरा नृप ॥ १ ॥
विशीर्यमाणां पृतनां आसुरीं असुरर्षभः । 
कालानुकूलैः त्रिदशैः काल्यमानामनाथवत् ॥ २ ॥
दृष्ट्वातप्यत सङ्‌क्रुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षितः । 
तान्निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्येदमुवाच ह ॥ ३ ॥
किं व उच्चरितैर्मातुः धावद्‌भिः पृष्ठतो हतैः । 
न हि भीतवधः श्लाघ्यो न स्वर्ग्यः शूरमानिनाम् ॥ ४ ॥
यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि । 
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद्‍ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी। उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामीके धर्मानुकूल वचनोंपर भी ध्यान न दिया ॥ १ ॥ वृत्रासुरने देखा कि समयकी अनुकूलताके कारण देवतालोग असुरोंकी सेनाको खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो रही है, मानो बिना नायककी हो ॥ २ ॥ राजन् ! यह देखकर वृत्रासुर असहिष्णुता और क्रोधके मारे तिलमिला उठा। उसने बलपूर्वक देवसेनाको आगे बढऩेसे रोक दिया और उन्हें डाँटकर ललकारते हुए कहा— ॥ ३ ॥ ‘क्षुद्र देवताओ! रणभूमिमें पीठ दिखानेवाले कायर असुरोंपर पीछेसे प्रहार करनेमें क्या लाभ है। ये लोग तो अपने मा-बापके मल-मूत्र हैं। परन्तु अपनेको शूरवीर माननेवाले तुम्हारे-जैसे पुरुषोंके लिये भी तो डरपोकोंको मारना कोई प्रशंसाकी बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है ॥ ४ ॥ यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो’ ॥ ५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

जातस्य मृत्युर्ध्रुव एव सर्वतः 
     प्रतिक्रिया यस्य न चेह कॢप्ता । 
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं 
     को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥ ३२ ॥
द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ 
     यद्‍ब्रह्मसन्धारणया जितासुः । 
कलेवरं योगरतो विजह्याद् 
     यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥ ३३ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा। इस जगत्में विधाता ने मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं बताया है । ऐसी स्थिति में यदि मृत्युके द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्यु को न अपनायेगा ॥ ३२ ॥ संसार में दो प्रकार की मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है—एक तो योगी पुरुष का अपने प्राणों को वश में करके ब्रह्मचिन्तन के द्वारा शरीर का परित्याग और दूसरा युद्धभूमिमें सेनाके आगे रहकर बिना पीठ दिखाये जूझ मरना (तुमलोग भला, ऐसा शुभ अवसर क्यों खो रहे हो)’ ॥ ३३ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम दशमोऽध्या‍यः ॥ १० ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 11 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

तानक्षतान् स्वस्तिमतो निशाम्य 
     शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथाः । 
द्रुमैर्दृषद्‍भिर्विविधाद्रिश्रृङ्‌गैः 
     अविक्षतान् तत्रसुरिन्द्रसैनिकान् ॥ २७ ॥
सर्वे प्रयासा अभवन्विमोघाः 
     कृताः कृता देवगणेषु दैत्यैः । 
कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु 
     क्षुद्रैः प्रयुक्ता ऊषती रूक्षवाचः ॥ २८ ॥
ते स्वप्रयासं वितथं निरीक्ष्य 
     हरावभक्ता हतयुद्धदर्पाः । 
पलायनायाजिमुखे विसृज्य 
     पतिं मनस्ते दधुरात्तसाराः ॥ २९ ॥
वृत्रोऽसुरान् तान् अनुगान् मनस्वी 
     प्रधावतः प्रेक्ष्य बभाष एतत् । 
पलायितं प्रेक्ष्य बलं च भग्नं 
     भयेन तीव्रेण विहस्य वीरः ॥ ३० ॥
कालोपपन्नां रुचिरां मनस्विनां 
     मुवाच वाचं पुरुषप्रवीरः । 
हे विप्रचित्ते नमुचे पुलोमन् 
     मयानर्वन्छम्बर मे श्रृणुध्वम् ॥ ३१ ॥

परीक्षित्‌ ! जब वृत्रासुर के अनुयायी असुरों ने देखा कि उनके असंख्य अस्त्र-शस्त्र भी देव- सेना का कुछ न बिगाड़ सके—यहाँ तक कि वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ों के बड़े-बड़े शिखरों से भी उनके शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी, सब-के-सब सकुशल हैं—तब तो वे बहुत डर गये। दैत्यलोग देवताओं को पराजित करनेके लिये जो-जो प्रयत्न करते, वे सब-के-सब निष्फल हो जाते—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित भक्तोंपर क्षुद्र मनुष्यों के कठोर और अमङ्गलमय दुर्वचनोंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ॥ २७-२८ ॥ भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये। उनका वीरताका घमंड जाता रहा। अब वे अपने सरदार वृत्रासुरको युद्धभूमिमें ही छोडक़र भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओं ने उनका सारा बल-पौरुष छीन लिया था ॥ २९ ॥ जब धीर-वीर वृत्रासुर ने देखा कि मेरे अनुयायी असुर भाग रहे हैं और अत्यन्त भयभीत होकर मेरी सेना भी तहस-नहस और तितर-बितर हो रही है, तब वह हँसकर कहने लगा ॥ ३० ॥ वीरशिरोमणि वृत्रासुरने समयानुसार वीरोचित वाणीसे विप्रचित्ति, नमुचि, पुलोमा, मय, अनर्वा, शम्बर आदि दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—‘असुरो ! भागो मत, मेरी एक बात सुन लो ॥ ३१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

अभ्यर्दयन् असम्भ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः । 
गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्‍गरतोमरैः ॥ २२ ॥
शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः । 
सर्वतोऽवाकिरन्शस्त्रैः अस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ॥ २३ ॥
न तेऽदृश्यन्त सञ्छन्नाः शरजालैः समन्ततः । 
पुङ्‌खानुपुङ्‌खपतितैः ज्योतींषीव नभोघनैः ॥ २४ ॥
न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् । 
छिन्नाः सिद्धपथे देवैः लघुहस्तैः सहस्रधा ॥ २५ ॥
अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिश्रृङ्‌गद्रुमोपलैः । 
अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ॥ २६ ॥

वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानी से देवसेना पर प्रहार करने लगे। उन लोगों ने गदा, परिघ, बाण,प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार,शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि आदि अस्त्र-शस्त्रों की बौछार से देवताओं को सब ओर से ढक दिया ॥ २२-२३ ॥ एक-पर-एक इतने बाण चारों ओर से आ रहे थे कि उनसे ढक जाने के कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे—जैसे बादलों से ढक जाने पर आकाश के तारे नहीं दिखायी देते ॥ २४ ॥ परीक्षित्‌ ! वह शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा देवसैनिकों को छू तक न सकी । उन्होंने अपने हस्तलाघव से आकाश में ही उनके हजार-हजार टुकड़े कर दिये ॥ २५ ॥ जब असुरों के अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वे देवताओं की सेना पर पर्वतों के शिखर, वृक्ष और पत्थर बरसाने लगे । परन्तु देवताओं ने उन्हें पहले-की ही भाँति काट गिराया ॥२६॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

ततः सुराणामसुरै रणः परमदारुणः । 
त्रेतामुखे नर्मदायां अभवत् प्रथमे युगे ॥ १६ ॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैः अश्विभ्यां पितृवह्निभिः । 
मरुद्‌भिः ऋभुभिः साध्यैः विश्वेदेवैः मरुत्पतिम् ॥ १७ ॥
दृष्ट्वा वज्रधरं शक्रं रोचमानं स्वया श्रिया । 
नामृष्यन्नसुरा राजन् मृधे वृत्रपुरःसराः ॥ १८ ॥
नमुचिः शम्बरोऽनर्वा द्विमूर्धा ऋषभोऽम्बरः । 
हयग्रीवः शङ्‌कुशिरा विप्रचित्तिः अयोमुखः ॥ १९ ॥
पुलोमा वृषपर्वा च प्रहेतिर्हेतिरुत्कलः । 
दैतेया दानवा यक्षा रक्षांसि च सहस्रशः ॥ २० ॥
सुमालिमालिप्रमुखाः कार्तस्वरपरिच्छदाः । 
प्रतिषिध्येन्द्रसेनाग्रं मृत्योरपि दुरासदम् ॥ २१ ॥

(श्रीशुकदेवजी कह रहे हैं) जो वैवस्वतमन्वन्तर इस समय चल रहा है, इसकी पहली चतुर्युगी का त्रेतायुग अभी आरम्भ ही हुआ था। उसी समय नर्मदातटपर देवताओं का दैत्यों के साथ यह भयंकर संग्राम हुआ ॥ १६ ॥ उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये ॥ १७-१८ ॥ तब नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, ऋषभ, अम्बर, हयग्रीव, शङ्कुशिरा, विप्रचित्ति, अयोमुख, पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति, उत्कल, सुमाली, माली आदि हजारों दैत्य- दानव एवं यक्ष-राक्षस स्वर्णके साज-सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेनाको आगे बढऩेसे रोकने लगे। परीक्षित्‌ ! उस समय देवताओंकी सेना स्वयं मृत्युके लिये भी अजेय थी ॥ १९—२१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

श्रीशुक उवाच - 
एवं कृतव्यवसितो दध्यङ्‌ङाथर्वणस्तनुम् । 
परे भगवति ब्रह्मणि आत्मानं सन्नयन्जहौ ॥ ११ ॥
यताक्षासुमनोबुद्धिः तत्त्वदृग् ध्वस्तबन्धनः । 
आस्थितः परमं योगं न देहं बुबुधे गतम् ॥ १२ ॥
अथेन्द्रो वज्रमुद्यम्य निर्मितं विश्वकर्मणा । 
मुनेः शक्तिभिरुत्सिक्तो भगवत् तेजसान्वितः ॥ १३ ॥
वृतो देवगणैः सर्वैः गजेन्द्रोपर्यशोभत । 
स्तूयमानो मुनिगणैः त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥ १४ ॥
वृत्रमभ्यद्रवच्छत्रुं असुरानीकयूथपैः । 
पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम् ॥ १५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! अथर्ववेदी महर्षि दधीचिने ऐसा निश्चय करके अपने को परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌ में लीन करके अपना स्थूल शरीर त्याग दिया ॥ ११ ॥ उनके इन्द्रिय,प्राण,मन और बुद्धि संयत थे, दृष्टि तत्त्वमयी थी, उनके सारे बन्धन कट चुके थे । अत: जब वे भगवान्‌ से अत्यन्त युक्त होकर स्थित हो गये, तब उन्हें इस बातका पता ही न चला कि मेरा शरीर छूट गया ॥ १२ ॥
भगवान्‌ की शक्ति पाकर इन्द्र का बल-पौरुष उन्नति की सीमा पर पहुँच गया। अब विश्वकर्माजी ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वज्र बनाकर उन्हें दिया और वे उसे हाथ में लेकर ऐरावत हाथीपर सवार हुए। उनके साथ-साथ सभी देवतालोग तैयार हो गये। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि देवराज इन्द्र की स्तुति करने लगे। अब उन्होंने त्रिलोकी को हर्षित करते हुए वृत्रासुरका वध करने के लिये उसपर पूरी शक्ति लगाकर धावा बोल दिया—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान्‌ रुद्र क्रोधित होकर स्वयं कालपर ही आक्रमण कर रहे हों। परीक्षित्‌ ! वृत्रासुर भी दैत्य-सेनापतियोंकी बहुत बड़ी सेना के साथ मोर्चे पर डटा हुआ था ॥ १३—१५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

श्रीदेवा ऊचुः - 
किं नु तद् दुस्त्यजं ब्रह्मन् पुंसां भूतानुकम्पिनाम् । 
भवद्विधानां महतां पुण्यश्लोकेड्यकर्मणाम् ॥ ५ ॥
नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्‌कटम् । 
यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥

श्रीऋषिरुवाच - 
धर्मं वः श्रोतुकामेन यूयं मे प्रत्युदाहृताः । 
एष वः प्रियमात्मानं त्यजन्तं सन्त्यजाम्यहम् ॥ ७ ॥
योऽध्रुवेणात्मना नाथा न धर्मं न यशः पुमान् । 
ईहेत भूतदयया स शोच्यः स्थावरैरपि ॥ ८ ॥
एतावानव्ययो धर्मः पुण्यश्लोकैरुपासितः । 
यो भूतशोकहर्षाभ्यां आत्मा शोचति हृष्यति ॥ ९ ॥
अहो दैन्यमहो कष्टं पारक्यैः क्षणभङ्‌गुरैः । 
यन्नोपकुर्यादस्वार्थैः मर्त्यः स्वज्ञातिविग्रहैः ॥ १० ॥

देवताओंने कहा—ब्रह्मन् ! आप-जैसे उदार और प्राणियोंपर दया करनेवाले महापुरुष, जिनके कर्मोंकी बड़े-बड़े यशस्वी महानुभाव भी प्रशंसा करते हैं, प्राणियोंकी भलाई के लिये कौन-सी वस्तु निछावर नहीं कर सकते ॥ ५ ॥ भगवन्! इसमें सन्देह नहीं कि माँगनेवाले लोग स्वार्थी होते हैं। उनमें देनेवालोंकी कठिनाईका विचार करनेकी बुद्धि नहीं होती। यदि उनमें इतनी समझ होती तो वे माँगते ही क्यों। इसी प्रकार दाता भी माँगनेवालेकी विपत्ति नहीं जानता। अन्यथा उसके मुँहसे कदापि नाहीं न निकलती (इसलिये आप हमारी विपत्ति समझकर हमारी याचना पूर्ण कीजिये।) ॥ ६ ॥
दधीचि ऋषिने कहा—देवताओ! मैंने आपलोगोंके मुँहसे धर्मकी बात सुननेके लिये ही आपकी माँग के प्रति उपेक्षा दिखलायी थी। यह लीजिये, मैं अपने प्यारे शरीर को आप लोगों के लिये अभी छोड़े देता हूँ । क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोडऩेवाला है ॥ ७ ॥ देवशिरोमणियो ! जो मनुष्य इस विनाशी शरीर से दु:खी प्राणियों पर दया करके मुख्यत: धर्म और गौणत: यशका सम्पादन नहीं करता, वह जड़ पेड़-पौधों से भी गया-बीता है ॥ ८ ॥ बड़े-बड़े महात्माओं ने इस अविनाशी धर्म की उपासना की है। उसका स्वरूप बस, इतना ही है कि मनुष्य किसी भी प्राणी के दु:ख में दु:ख का अनुभव करे और सुख में सुख का ॥ ९ ॥ जगत् के धन, जन और शरीर आदि पदार्थ क्षणभङ्गुर हैं । ये अपने किसी काम नहीं आते, अन्तमें दूसरों के ही काम आयेंगे। ओह ! यह कैसी कृपणता है, कितने दु:ख की बात है कि यह मरणधर्मा मनुष्य इनके द्वारा दूसरों का उपकार नहीं कर लेता ॥ १० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

श्रीशुक उवाच - 
इन्द्रमेवं समादिश्य भगवान् विश्वभावनः । 
पश्यतां अनिमेषाणां अत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥ १ ॥
तथाभियाचितो देवैः ऋषिः आथर्वणो महान् । 
मोदमान उवाचेदं प्रहसन्निव भारत ॥ २ ॥
अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम् । 
संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापहः ॥ ३ ॥
जिजीविषूणां जीवानां आत्मा प्रेष्ठ इहेप्सितः । 
क उत्सहेत तं दातुं भिक्षमाणाय विष्णवे ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विश्व के जीवनदाता श्रीहरि इन्द्र को इस प्रकार आदेश देकर देवताओं के सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १ ॥ अब देवताओं ने उदारशिरोमणि अथर्ववेदी दधीचि ऋषि के पास जाकर भगवान्‌के आज्ञानुसार याचना की। देवताओंकी याचना सुनकर दधीचि ऋषि को बड़ा आनन्द हुआ । उन्होंने हँसकर देवताओंसे कहा— ॥२॥ ‘देवताओ ! आपलोगों को सम्भवत: यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियोंको बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जबतक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्तमें वे मूर्च्छित हो जाते हैं ॥ ३ ॥ जो जीव जगत् में जीवित रहना चाहते है, उनके लिये शरीर बहुत ही अनमोल, प्रियतम एवं अभीष्ट वस्तु है। ऐसी स्थितिमें स्वयं विष्णुभगवान्‌ भी यदि जीवसे उसका शरीर माँगें तो कौन उसे देनेका साहस करेगा ॥ ४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


बुधवार, 8 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट१९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१९)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

स वा अधिगतो दध्यङ्ङश्विभ्यां ब्रह्म निष्कलम् ।
यद्वा अश्वशिरो नाम तयोरमरतां व्यधात् ॥ ५२ ॥
दध्यङ्ङाथर्वणस्त्वष्ट्रे वर्माभेद्यं मदात्मकम् ।
विश्वरूपाय यत्प्रादात्त्वष्टा यत्त्वमधास्ततः ॥ ५३ ॥
युष्मभ्यं याचितोऽश्विभ्यां धर्मज्ञोऽङ्गानि दास्यति ।
ततस्तैरायुधश्रेष्ठो विश्वकर्मविनिर्मितः ।
येन वृत्रशिरो हर्ता मत्तेजौपबृंहितः ॥ ५४ ॥
तस्मिन् विनिहते यूयं तेजोऽस्त्रायुधसम्पदः ।
भूयः प्राप्स्यथ भद्रं वो न हिंसन्ति च मत्परान् ॥ ५५ ॥

(श्रीभगवान्‌ देवताओं को कह रहे हैं) दधीचि ऋषि को शुद्ध ब्रह्मका ज्ञान है। अश्विनीकुमारों को घोड़ेके सिरसे उपदेश करनेके कारण उनका एक नाम ‘अश्वशिर’[*] भी है। उनकी उपदेश की हुई आत्मविद्याके प्रभावसे ही दोनों अश्विनीकुमार जीवन्मुक्त हो गये ॥ ५२ ॥ अथर्ववेदी दधीचि ऋषिने ही पहले-पहल मेरे स्वरूपभूत अभेद्य नारायणकवच का त्वष्टा को उपदेश किया था। त्वष्टाने वही विश्वरूपको दिया और विश्वरूपसे तुम्हें मिला ॥ ५३ ॥ दधीचि ऋषि धर्मके परम मर्मज्ञ हैं। वे तुमलोगोंको, अश्विनीकुमारके माँगनेपर, अपने शरीरके अङ्ग अवश्य दे देंगे। इसके बाद विश्वकर्माके द्वारा उन अङ्गोंसे एक श्रेष्ठ आयुध तैयार करा लेना। देवराज ! मेरी शक्तिसे युक्त होकर तुम उसी शस्त्रके द्वारा वृत्रासुरका सिर काट लोगे ॥ ५४ ॥ देवताओ ! वृत्रासुर के मर जानेपर तुम लोगोंको फिरसे तेज, अस्त्र-शस्त्र और सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जायँगी। तुम्हारा कल्याण अवश्यम्भावी है; क्योंकि मेरे शरणागतों को कोई सता नहीं सकता ॥ ५५ ॥
..........................................................
[*] यह कथा इस प्रकार है—दधीचि ऋषिको प्रवर्ग्य (यज्ञकर्मविशेष) और ब्रह्मविद्या का उत्तम ज्ञान है—यह जानकर एक बार उनके पास अश्विनीकुमार आये और उनसे ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की। दधीचि मुनिने कहा—‘इस समय मैं एक कार्यमें लगा हुआ हूँ, इसलिये फिर किसी समय आना।’ इसपर अश्विनीकुमार चले गये। उनके जाते ही इन्द्रने आकर कहा—‘मुने ! अश्विनीकुमार वैद्य हैं, उन्हें तुम ब्रह्मविद्याका उपदेश मत करना। यदि तुम मेरी बात न मानकर उन्हें उपदेश करोगे तो मैं तुम्हारा सिर काट डालूँगा।’ जब ऐसा कहकर इन्द्र चले गये, तब अश्विनीकुमारोंने आकर फिर वही प्रार्थना की। मुनिने इन्द्रका सब वृत्तान्त सुनाया। इसपर अश्विनीकुमारोंने कहा—‘हम पहले ही आपका यह सिर काटकर घोड़ेका सिर जोड़ देंगे, उससे आप हमें उपदेश करें और जब इन्द्र आपका घोड़ेका सिर काट देंगे तब हम फिर असली सिर जोड़ देंगे।’ मुनिने मिथ्या-भाषणके भयसे उनका कथन स्वीकार कर लिया। इस प्रकार अश्वमुखसे उपदेश की जानेके कारण ब्रह्मविद्याका नाम ‘अश्वशिरा’ पड़ा।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नवमोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१८)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

श्रीशुक उवाच
अथैवमीडितो राजन् सादरं त्रिदशैर्हरिः ।
स्वमुपस्थानमाकर्ण्य प्राह तानभिनन्दितः ॥ ४६॥

श्रीभगवानुवाच
प्रीतोऽहं वः सुरश्रेष्ठा मदुपस्थानविद्यया ।
आत्मैश्वर्यस्मृतिः पुंसां भक्तिश्चैव यया मयि ॥ ४७ ॥
किं दुरापं मयि प्रीते तथापि विबुधर्षभाः ।
मय्येकान्तमतिर्नान्यन्मत्तो वाञ्छति तत्त्ववित् ॥ ४८ ॥
न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।
तस्य तानिच्छतो यच्छेद्यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ४९ ॥
स्वयं निःश्रेयसं विद्वान्न वक्त्यज्ञाय कर्म हि ।
न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषक्तमः ॥ ५० ॥
मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।
विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ५१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब देवताओने बड़े आदरके साथ इस प्रकार भगवान्‌ का स्तवन किया, तब वे अपनी स्तुति सुनकर बहुत प्रसन्न हुए तथा उनसे कहने लगे ॥ ४६ ॥
श्रीभगवान्‌ ने कहा—श्रेष्ठ देवताओं ! तुमलोगोंने स्तुतियुक्त ज्ञानसे मेरी उपासना की है, इससे मैं तुमलोगोंपर प्रसन्न हूँ। इस स्तुतिके द्वारा जीवोंको अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति और मेरी भक्ति प्राप्त होती है ॥ ४७ ॥ देवशिरोमणियो ! मेरे प्रसन्न हो जानेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तथापि मेरे अनन्यप्रेमी तत्त्ववेत्ता भक्त मुझसे मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहते ॥ ४८ ॥ जो पुरुष जगत् के विषयोंको सत्य समझता है, वह नासमझ अपने वास्तविक कल्याणको नहीं जानता। यही कारण है कि वह विषय चाहता है; परन्तु यदि कोई जानकार उसे उसकी इच्छित वस्तु दे देता है, तो वह भी वैसा ही नासमझ है ॥ ४९ ॥ जो पुरुष मुक्तिका स्वरूप जानता है, वह अज्ञानीको भी कर्मोंमें फँसनेका उपदेश नहीं देता—जैसे रोगीके चाहते रहनेपर भी सद्वैद्य उसे कुपथ्य नहीं देता ॥ ५० ॥ देवराज इन्द्र ! तुमलोगोंका कल्याण हो। अब देर मत करो। ऋषिशिरोमणि दधीचिके पास जाओ और उनसे उनका शरीर—जो उपासना, व्रत तथा तपस्याके कारण अत्यन्त दृढ़ हो गया है—माँग लो ॥ ५१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण नभो गतो दिशः सर्वाः सह...