शनिवार, 29 नवंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - तीसवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध –तीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रचेताओं को श्रीविष्णुभगवान्‌ का वरदान

वयं तु साक्षाद्‍भगवन् भवस्य
     प्रियस्य सख्युः क्षणसङ्‌गमेन ।
सुदुश्चिकित्स्यस्य भवस्य मृत्योः
     भिषक्तमं त्वाद्य गतिं गताः स्म ॥ ३८ ॥
यन्नः स्वधीतं गुरवः प्रसादिता
     विप्राश्च वृद्धाश्च सदानुवृत्त्या ।
आर्या नताः सुहृदो भ्रातरश्च
     सर्वाणि भूतान्यनसूययैव ॥ ३९ ॥
यन्नः सुतप्तं तप एतदीश
     निरन्धसां कालमदभ्रमप्सु ।
सर्वं तदेतत्पुरुषस्य भूम्नो
     वृणीमहे ते परितोषणाय ॥ ४० ॥
मनुः स्वयम्भूर्भगवान् भवश्च
     येऽन्ये तपोज्ञानविशुद्धसत्त्वाः ।
अदृष्टपारा अपि यन्महिम्नः
     स्तुवन्त्यथो त्वात्मसमं गृणीमः ॥ ४१ ॥
नमः समाय शुद्धाय पुरुषाय पराय च ।
वासुदेवाय सत्त्वाय तुभ्यं भगवते नमः ॥ ४२ ॥

(प्रचेता स्तुति कर रहे हैं) भगवन् ! आपके प्रिय सखा भगवान्‌ शङ्करके क्षणभरके समागमसे ही आज हमें आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है। आप जन्म-मरणरूप दु:साध्य रोगके श्रेष्ठतम वैद्य हैं, अत: अब हमने आपका ही आश्रय लिया है ॥ ३८ ॥ प्रभो ! हमने समाहित चित्तसे जो कुछ अध्ययन किया है, निरन्तर सेवा-शुश्रूषा करके गुरु, ब्राह्मण और वृद्धजनोंको प्रसन्न किया है तथा दोषबुद्धि त्यागकर श्रेष्ठ पुरुष, सुहृद्गण, बन्धुवर्ग एवं समस्त प्राणियोंकी वन्दना की है और अन्नादिको त्यागकर दीर्घकालतक जलमें खड़े रहकर तपस्या की है, वह सब आप सर्वव्यापक पुरुषोत्तमके सन्तोषका कारण हो—यही वर माँगते हैं ॥ ३९-४० ॥ स्वामिन् ! आपकी महिमाका पार न पाकर भी स्वायम्भुव मनु, स्वयं ब्रह्माजी, भगवान्‌ शङ्कर तथा तप और ज्ञानसे शुद्धचित्त हुए अन्य पुरुष निरन्तर आपकी स्तुति करते रहते हैं। अत: हम भी अपनी बुद्धिके अनुसार आपका यशोगान करते हैं ॥ ४१ ॥ आप सर्वत्र समान शुद्ध स्वरूप और परम पुरुष हैं। आप सत्त्वमूर्ति भगवान्‌ वासुदेवको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹❤️🥀 ॐ श्री परमात्मने नमः
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - तीसवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  चतुर्थ स्कन्ध –तीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६) प्रचेताओं को श्रीविष्णुभगवान्‌ का वरदान ...