शनिवार, 10 जनवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध सत्रहवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

गङ्गाजीका विवरण और भगवान्‌ शङ्करकृत संकर्षणदेवकी स्तुति

यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं 
त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः
न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितं 
भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु ||२१||
यस्याद्य आसीद्गुणविग्रहो महान्  
विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल |
यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा 
वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ||२२||
एते वयं यस्य वशे महात्मनः 
स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः|
महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः 
सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् || २३||
यन्निर्मितां कर्ह्यपि कर्मपर्वणीं 
मायां जनोऽयं गुणसर्गमोहितः|
न वेद निस्तारणयोगमञ्जसा 
तस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ||२४||

वेदमन्त्र आपको जगत् की  उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण बताते हैं; परन्तु आप स्वयं इन तीनों विकारोंसे रहित हैं; इसलिये आपको ‘अनन्त’ कहते हैं। आपके सहस्र मस्तकोंपर यह भूमण्डल सरसोंके दानेके समान रखा हुआ है, आपको तो यह भी नहीं मालूम होता कि वह कहाँ स्थित है ॥ २१ ॥ जिनसे उत्पन्न हुआ मैं अहंकाररूप अपने त्रिगुणमय तेजसे देवता, इन्द्रिय और भूतोंकी रचना करता हूँ—वे विज्ञानके आश्रय भगवान्‌ ब्रह्माजी भी आपके ही महत्तत्त्वसंज्ञक प्रथम गुणमय स्वरूप हैं ॥ २२ ॥ महात्मन् ! महत्तत्त्व, अहंकार-इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पञ्चभूत आदि हम सभी डोरीमें बँधे हुए पक्षीके समान आपकी क्रियाशक्तिके वशीभूत रहकर आपकी ही कृपासे इस जगत् की रचना करते हैं ॥ २३ ॥ सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टिसे मोहित हुआ यह जीव आपकी ही रची हुई तथा कर्म-बन्धनमें बाँधनेवाली मायाको तो कदाचित् जान भी लेता है, किन्तु उससे मुक्त होनेका उपाय उसे सुगमतासे नहीं मालूम होता। इस जगत् की उत्पत्ति और प्रलय भी आपके ही रूप हैं। ऐसे आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ’ ॥ २४ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀जय श्रीहरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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