रविवार, 11 जनवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०३)

नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ||१२||
हरिर्हि साक्षाद्भगवान्शरीरिणामात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम्
हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहे तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ||१३||
तस्माद्र जोरागविषादमन्यु मानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम्
हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं नृसिंहपादं भजताकुतोभयमिति ||१४||

जिस पुरुषकी भगवान्‌ में निष्काम भक्ति है, उसके हृदयमें समस्त देवता धर्म-ज्ञानादि सम्पूर्ण सद्गुणोंके सहित सदा निवास करते हैं। किन्तु जो भगवान्‌का भक्त नहीं है, उसमें महापुरुषोंके वे गुण आ ही कहाँसे सकते हैं ? वह तो तरह-तरहके संकल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयोंकी ओर ही दौड़ता रहता है ॥ १२ ॥ जैसे मछलियोंको जल अत्यन्त प्रिय—उनके जीवनका आधार होता है, उसी प्रकार साक्षात् श्रीहरि ही समस्त देहधारियोंके प्रियतम आत्मा हैं। उन्हें त्यागकर यदि कोई महत्त्वाभिमानी पुरुष घरमें आसक्त रहता है तो उस दशामें स्त्री-पुरुषोंका बड़प्पन केवल आयुको लेकर ही माना जाता है; गुणकी दृष्टिसे नहीं ॥ १३ ॥ अत: असुरगण ! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इच्छा, भय, दीनता और मानसिक सन्ताप के मूल तथा जन्म-मरणरूप संसारचक्र का वहन करनेवाले गृह आदिको त्यागकर भगवान्‌ नृसिंहके निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लो’ ॥ १४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💛🥀 जय श्रीहरि: !! 🙏
    ॐ श्री परमात्मने नमः
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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