॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – छब्बीसवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)
नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन
ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिँल्लोके वैशसे नरकेपतितान्निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति ॥ २५ ॥
य स्त्विह वै सवर्णां भार्यां द्विजो रेतः पाययति काममोहितस्तं पापकृतममुत्र रेतःकुल्यायां पातयित्वा रेतः सम्पाययन्ति ॥ २६ ॥
ये त्विह वै दस्यवोऽग्निदा गरदा ग्रामान् सार्थान् वा विलुम्पन्ति राजानो राजभटा वा तांश्चापि हि परेत्य यमदूता वज्रदंष्ट्राः श्वानः सप्तशतानि विंशतिश्च सरभसं खादन्ति ॥ २७ ॥
जो पाखण्डीलोग पाखण्डपूर्ण यज्ञोंमें पशुओंका वध करते हैं, उन्हें परलोक में वैशस (विशसन) नरक में डालकर वहाँके अधिकारी बहुत पीड़ा देकर काटते हैं ॥ २५ ॥ जो द्विज कामातुर होकर अपनी सवर्णा भार्याको वीर्यपान कराता है, उस पापीको मरनेके बाद यमदूत वीर्यकी नदी (लालाभक्ष नामक नरक) में डालकर वीर्य पिलाते हैं ॥ २६ ॥ जो कोई चोर अथवा राजा या राजपुरुष इस लोकमें किसीके घरमें आग लगा देते हैं, किसीको विष दे देते हैं अथवा गाँवों या व्यापारियोंकी टोलियोंको लूट लेते हैं, उन्हें मरनेके पश्चात् सारमेयादन नामक नरकमें वज्रकी-सी दाढ़ोंवाले सात सौ बीस यमदूत कुत्ते बनकर बड़े वेगसे काटने लगते हैं ॥ २७ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
जवाब देंहटाएंहरे राम हरे राम राम राम हरे हरे