॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०१)
यम और यमदूतोंका संवाद
श्रीराजोवाच
निशम्य देवः स्वभटोपवर्णितं प्रत्याह किं तानपि धर्मराजः
एवं हताज्ञो विहतान्मुरारेर्नैदेशिकैर्यस्य वशे जनोऽयम् ||१||
यमस्य देवस्य न दण्डभङ्गः कुतश्चनर्षे श्रुतपूर्व आसीत्
एतन्मुने वृश्चति लोकसंशयं न हि त्वदन्य इति मे विनिश्चितम् ||२||
श्रीशुक उवाच
भगवत्पुरुषै राजन्याम्याः प्रतिहतोद्यमाः
पतिं विज्ञापयामासुर्यमं संयमनीपतिम् ||३||
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन् ! देवाधिदेव धर्मराजके वशमें सारे जीव हैं और भगवान्के पार्षदोंने उन्हींकी आज्ञा भंग कर दी तथा उनके दूतोंको अपमानित कर दिया। जब उनके दूतोंने यमपुरीमें जाकर उनसे अजामिलका वृत्तान्त कह सुनाया, तब सब कुछ सुनकर उन्होंने अपने दूतोंसे क्या कहा ? ॥ १ ॥ ऋषिवर ! मैंने पहले यह बात कभी नहीं सुनी कि किसीने किसी भी कारणसे धर्मराजके शासनका उल्लङ्घन किया हो। भगवन् ! इस विषयमें लोग बहुत सन्देह करेंगे और उसका निवारण आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं कर सकता, ऐसा मेरा निश्चय है ॥ २ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित् ! जब भगवान्के पार्षदोंने यमदूतोंका प्रयत्न विफल कर दिया, तब उन लोगोंने संयमनीपुरीके स्वामी एवं अपने शासक यमराजके पास जाकर निवेदन किया ॥ ३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
💟🥀ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
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