॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – दूसरा अध्याय..(पोस्ट१०)
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और
अजामिलका परमधामगमन
*अनेक तार्किकों के मन में यह कल्पना उठती है कि नाम की महिमा वास्तविक नहीं है, अर्थवादमात्र है। उनके मनमें यह धारणा तो हो ही जाती है कि शराबकी एक बूँद भी पतित बनानेके लिये पर्याप्त है, परंतु यह विश्वास नहीं होता कि भगवान्का एक नाम भी परम कल्याणकारी है। शास्त्रोंमें भगवन्नाम-महिमाको अर्थवाद समझना पाप बताया है।
पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमा:।
तैरर्जितानि पुण्यानि तद्वदेव भवन्ति हि ।।
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मन्नामकीर्तनफलं विविधं निशम्य
न श्रद्दधाति मनुते यदुतार्थवादम् ।।
यो मानुषस्तमिह दु:खचये क्षिपामि
संसारघोरविविधार्तिनिपीडिताङ्गम् ।।
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अर्थवादं हरेर्नाम्नि संभावयति यो नर:।
स पापिष्ठो मनुष्याणां नरके पतति स्फुटम् ।।
‘जो नराधम पुराणों में अर्थवाद की कल्पना करते हैं उनके द्वारा उपार्जित पुण्य वैसे ही हो जाते हैं।’
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‘जो मनुष्य मेरे नाम-कीर्तन के विविध फल सुनकर उसपर श्रद्धा नहीं करता और उसे अर्थवाद मानता है, उसको संसार के विविध घोर तापों से पीडि़त होना पड़ता है और उसे मैं अनेक दु:खों में डाल देता हूँ।’ - - - - ‘जो मनुष्य भगवान् के नाम में अर्थवाद की सम्भावना करता है, वह मनुष्योंमें अत्यन्त पापी है और उसे नरकमें गिरना पड़ता है।’
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💖🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः
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