बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

शुक उवाच 

तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तरआस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्याताऽनन्त इति 
सात्वतीया द्रष्ट्टदृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान- लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्षते ॥ १ ॥ 
यस्येदं क्षितिमण्डले भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते ॥ २ ॥ 
यस्य ह वा इदं कालेनोपसंजिहीर्षतोऽमर्ष- विरचितरुचिरभ्रमद्‌भुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र 
एकादशव्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन्नुदतिष्ठत् ॥ ३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर अनन्त नामसे विख्यात भगवान्‌की तामसी नित्य कला है। यह अहंकाररूपा होनेसे द्रष्टा और दृश्यको खींचकर एक कर देती है, इसलिये पाञ्चरात्र आगम के अनुयायी भक्तजन इसे ‘सङ्कर्षण’ कहते हैं ॥ १ ॥ इन भगवान्‌ अनन्तके एक हजार मस्तक हैं। उनमेंसे एकपर रखा हुआ यह सारा भूमण्डल सरसों के दाने के समान दिखायी देता है ॥ २ ॥ प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जब इन्हें इस विश्वका उपसंहार करनेकी इच्छा होती है, तब इनकी क्रोधवश घूमती हुई मनोहर भ्रुकुटियोंके मध्यभागसे सङ्कर्षण नामक रुद्र प्रकट होते हैं। उनकी व्यूहसंख्या ग्यारह है। वे सभी तीन नेत्रोंवाले होते हैं और हाथमें तीन नोकोंवाले शूल लिये रहते हैं ॥ ३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹🩷🥀जय श्री हरि: !! 🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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