गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध पचीसवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – पचीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

श्रीसङ्कर्षणदेव का विवरण और स्तुति

ध्यायमानः सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधर- मुनिगणैरनवरतमदमुदितविकृतविह्वललोचनः 
सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमानःस्वपार्षदविबुधयूथपतीनपरिम्लानरागनवतुलसिकामोदमध्वासवेन माद्यन्मधुकरत्रातमधुरगीतश्रियं वैजयन्तीं स्वां वनमालां नीलवासा एककुण्डलो हलककुदि 
कृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान्माहेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्चनीं कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ॥ ७ ॥ 
य एष एवमनुश्रुतो ध्यायमानो मुमुक्षूणामनादि- कालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्नन्थिं 
सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान् भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह 
तुम्बुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ८ ॥ 

देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनिगण भगवान्‌ अनन्तका ध्यान किया करते हैं। उनके नेत्र निरन्तर प्रेममदसे मुदित, चञ्चल और विह्वल रहते हैं। वे सुललित वचनामृतसे अपने पार्षद और देवयूथपोंको सन्तुष्ट करते रहते हैं। उनके अङ्गपर नीलाम्बर और कानोंमें केवल एक कुण्डल जगमगाता रहता है तथा उनका सुभग और सुन्दर हाथ हलकी मूठपर रखा रहता है। वे उदारलीलामय भगवान्‌ सङ्कर्षण गलेमें वैजयन्ती माला धारण किये रहते हैं, जो साक्षात् इन्द्रके हाथी ऐरावतके गलेमें पड़ी हुई सुवर्णकी शृङ्खलाके समान जान पड़ती है। जिसकी कान्ति कभी फीकी नहीं पड़ती, ऐसी नवीन तुलसीकी गन्ध और मधुर मकरन्दसे उन्मत्त हुए भौंरे निरन्तर मधुर गुंजार करके उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं ॥ ७ ॥
परीक्षित्‌ ! इस प्रकार भगवान्‌ अनन्त माहात्म्य श्रवण और ध्यान करनेसे मुमुक्षुओंके हृदयमें आविर्भूत होकर उनकी अनादिकालीन कर्मवासनाओंसे ग्रथित सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक अविद्यामयी हृदयग्रन्थिको तत्काल काट डालते हैं। उनके गुणोंका एक बार ब्रह्माजीके पुत्र भगवान्‌ नारद ने तुम्बुरु गन्धर्व के साथ ब्रह्माजी की सभा में इस प्रकार गान किया था ॥ ८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀 ॐ श्री परमात्मने नमः
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    जय हो मेरे राधा रमण बिहारी जी महाराज 🙏🙏

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७) वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति अहं हरे तव प...