॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट११)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
श्रीभगवानुवाच
प्राचेतस महाभाग संसिद्धस्तपसा भवान्
यच्छ्रद्धया मत्परया मयि भावं परं गतः ||४३||
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तपः
ममैष कामो भूतानां यद्भूयासुर्विभूतयः ||४४||
ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः
विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ||४५||
तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाकृतिः
अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासवः सुराः ||४६||
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत्किञ्चान्तरं बहिः
संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ||४७||
श्रीभगवान् ने कहा—परम भाग्यवान् दक्ष ! अब तुम्हारी तपस्या सिद्ध हो गयी, क्योंकि मुझपर श्रद्धा करनेसे तुम्हारे हृदयमें मेरे प्रति परम प्रेमभावका उदय हो गया है ॥ ४३ ॥ प्रजापते ! तुमने इस विश्वकी वृद्धिके लिये तपस्या की है, इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि यह मेरी ही इच्छा है कि जगत् के समस्त प्राणी अभिवृद्ध और समृद्ध हों ॥ ४४ ॥ ब्रह्मा, शङ्कर, तुम्हारे जैसे प्रजापति, स्वायम्भुव आदि मनु तथा इन्द्रादि देवेश्वर—ये सब मेरी विभूतियाँ हैं और सभी प्राणियोंकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥ ब्रह्मन् ! तपस्या मेरा हृदय है, विद्या शरीर है, कर्म आकृति है, यज्ञ अङ्ग हैं, धर्म मन है और देवता प्राण हैं ॥ ४६ ॥ जब यह सृष्टि नहीं थी, तब केवल मैं ही था और वह भी निष्क्रियरूपमें। बाहर- भीतर कहीं भी और कुछ न था। न तो कोई द्रष्टा था और न दृश्य। मैं केवल ज्ञानस्वरूप और अव्यक्त था। ऐसा समझ लो, मानो सब ओर सुषुप्ति-ही-सुषुप्ति छा रही हो ॥ ४७ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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