॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रत्त्रिभुवनेश्वरः
वृतो नारदनन्दाद्यैः पार्षदैः सुरयूथपैः ||३९||
स्तूयमानोऽनुगायद्भिः सिद्धगन्धर्वचारणैः
रूपं तन्महदाश्चर्यं विचक्ष्यागतसाध्वसः ||४०||
ननाम दण्डवद्भूमौ प्रहृष्टात्मा प्रजापतिः
न किञ्चनोदीरयितुमशकत्तीव्रया मुदा
आपूरितमनोद्वारैर्ह्रदिन्य इव निर्झरैः ||४१||
तं तथावनतं भक्तं प्रजाकामं प्रजापतिम्
चित्तज्ञः सर्वभूतानामिदमाह जनार्दनः ||४२||
त्रिभुवनपति भगवान् ने त्रैलोक्यविमोहन रूप धारण कर रखा था। नारद, नन्द, सुनन्द आदि पार्षद उनके चारों ओर खड़े थे। इन्द्र आदि देवेश्वरगण स्तुति कर रहे थे तथा सिद्ध, गन्धर्व और चारण भगवान्के गुणोंका गान कर रहे थे। यह अत्यन्त आश्चर्यमय और अलौकिक रूप देखकर दक्षप्रजापति कुछ सहम गये ॥ ३९-४० ॥ प्रजापति दक्ष ने आनन्द से भरकर भगवान् के चरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया। जैसे झरनोंके जलसे नदियाँ भर जाती हैं, वैसे ही परमानन्द के उद्रेक से उनकी एक-एक इन्द्रिय भर गयी और आनन्दपरवश हो जानेके कारण वे कुछ भी बोल न सके ॥ ४१ ॥ परीक्षित् ! प्रजापति दक्ष अत्यन्त नम्रता से झुककर भगवान् के सामने खड़े हो गये। भगवान् सब के हृदय की बात जानते ही हैं, उन्होंने दक्ष प्रजापतिकी भक्ति और प्रजावृद्धिकी कामना देखकर उनसे यों कहा ॥ ४२ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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