सोमवार, 9 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०९)

दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्भाव

श्रीशुक उवाच

इति स्तुतः संस्तुवतः स तस्मिन्नघमर्षणे
प्रादुरासीत्कुरुश्रेष्ठ भगवान्भक्तवत्सलः ||३५||
कृतपादः सुपर्णांसे प्रलम्बाष्टमहाभुजः
चक्रशङ्खासिचर्मेषु धनुःपाशगदाधरः ||३६||
पीतवासा घनश्यामः प्रसन्नवदनेक्षणः
वनमालानिवीताङ्गो लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभः ||३७||
महाकिरीटकटकः स्फुरन्मकरकुण्डलः
काञ्च्यङ्गुलीयवलय नूपुराङ्गदभूषितः ||३८||

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विन्ध्याचल के अघमर्षण तीर्थ में जब प्रजापति दक्ष ने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान्‌ उनके सामने प्रकट हुए ॥ ३५ ॥ उस समय भगवान्‌ गरुडक़े कंधों पर चरण रखे हुए थे। विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट आठ भुजाएँ थीं; उनमें चक्र, शङ्ख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और गदा धारण किये हुए थे ॥ ३६ ॥ वर्षाकालीन मेघ  के समान श्यामल शरीर पर पीताम्बर फहरा रहा था। मुखमण्डल प्रफुल्लित था। नेत्रोंसे प्रसादकी वर्षा हो रही थी। घुटनोंतक वनमाला लटक रही थी। वक्ष:स्थलपर सुनहरी रेखा—श्रीवत्सचिह्न और गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही थी ॥ ३७ ॥ बहुमूल्य किरीट, कंगन, मकराकृति कुण्डल, करधनी, अँगूठी, कड़े, नूपुर और बाजूबंद अपने-अपने स्थानपर सुशोभित थे ॥ ३८ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध चौथा अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट१०) दक्ष के द्वारा भगवान्‌ की स्तुति और भगवान्‌ का प्रादुर्...