रविवार, 22 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण

श्रीदेवा ऊचुः
वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते
कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः ||२७||
पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम्
अपि पुत्रवतां ब्रह्मन्किमुत ब्रह्मचारिणाम् ||२८||
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः
भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात्क्षितेस्तनुः ||२९||
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्
अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः ||३०||
तस्मात्पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम्
तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि ||३१||
वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम्
यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा ||३२||
न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम्
छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन्वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ||३३||

श्रीऋषिरुवाच
अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरहित्ये महातपाः
स विश्वरूपस्तानाह प्रसन्नः श्लक्ष्णया गिरा ||३४||

देवताओं ने कहा—बेटा विश्वरूप ! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथि के रूप में आये हैं। हम एक प्रकार से तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हम लोगों की समयोचित अभिलाषा पूर्ण करो ॥ २७ ॥ जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २८ ॥ वत्स ! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजी की, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वी की मूर्ति होती है ॥ २९ ॥ (इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्नि की और जगत् के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं ॥ ३० ॥ पुत्र ! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दु:खी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दु:ख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र ! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ॥ ३१ ॥ तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अत: जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥ ३२ ॥ पुत्र ! आवश्यकता पडऩेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोडक़र केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है ॥ ३३ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! जब देवताओंने इस प्रकार विश्वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्वरूपने प्रसन्न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा ॥ ३४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः🙏
    श्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः
    जय श्री हरि: !!

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