॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०८)
दक्ष के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का प्रादुर्भाव
योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-
मनामरूपो भगवाननन्तः
नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-
र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदतु ||३३||
यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां
यथाशयं देहगतो विभाति
यथानिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं
स ईश्वरो मे कुरुतां मनोरथम् ||३४||
प्रभो ! आप अनन्त हैं। आपका न तो कोई प्राकृत नाम है और न कोई प्राकृत रूप; फिर भी जो आपके चरणकमलोंका भजन करते हैं, उनपर अनुग्रह करनेके लिये आप अनेक रूपोंमें प्रकट होकर अनेकों लीलाएँ करते हैं तथा उन-उन रूपों एवं लीलाओं के अनुसार अनेकों नाम धारण कर लेते हैं। परमात्मन् ! आप मुझपर कृपा-प्रसाद कीजिये ॥ ३३ ॥ लोगोंकी उपासनाएँ प्राय: साधारण कोटिकी होती हैं। अत: आप सबके हृदयमें रहकर उनकी भावनाके अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओंके रूपमें प्रतीत होते रहते हैं—ठीक वैसे ही जैसे हवा गन्धका आश्रय लेकर सुगन्धित प्रतीत होती है; परन्तु वास्तवमें सुगन्धित नहीं होती। ऐसे सबकी भावनाओंका अनुसरण करनेवाले प्रभु मेरी अभिलाषा पूर्ण करें ॥ ३४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌷🩷🥀जय श्री हरि: !! 🙏
जवाब देंहटाएंॐ नमो भगवते वासुदेवाय
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि: !!