बुधवार, 13 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

एकः सृजति भूतानि भगवान् आत्ममायया । 
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः ॥ २१ ॥
न तस्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो 
     न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः । 
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य 
     सुखे न रागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥
तथापि तच्छक्तिविसर्ग एषां 
     सुखाय दुःखाय हिताहिताय । 
बन्धाय मोक्षाय च मृत्युजन्मनोः 
     शरीरिणां संसृतयेऽवकल्पते ॥ २३ ॥
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि । 
यन्मन्यसे ह्यसाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति ॥ २४ ॥

श्रीशुक उवाच - 
इति प्रसाद्य गिरिशौ चित्रकेतुररिन्दम । 
जगाम स्वविमानेन पश्यतोः स्मयतोस्तयोः ॥ २५ ॥
ततस्तु भगवान्रुद्रो रुद्राणीं इदमब्रवीत् । 
देवर्षिदैत्यसिद्धानां पार्षदानां च श्रृण्वताम् ॥ २६ ॥

एकमात्र परिपूर्णतम भगवान्‌ ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दु:खकी रचना करते हैं ॥ २१ ॥ माताजी ! भगवान्‌ श्रीहरि सबमें सम और माया आदि मलसे रहित हैं। उनका कोई प्रिय-अप्रिय, जाति-बन्धु, अपना-पराया नहीं है। जब उनका सुखमें राग ही नहीं है, तब उनमें रागजन्य क्रोध तो हो ही कैसे सकता है ॥ २२ ॥ तथापि उनकी मायाशक्तिके कार्य पाप और पुण्य ही प्राणियोंके सुख-दु:ख, हित-अहित, बन्ध-मोक्ष, मृत्यु-जन्म और आवागमनके कारण बनते हैं ॥ २३ ॥ पतिप्राणा देवि ! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें ॥ २४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! विद्याधर चित्रकेतु भगवान्‌ शङ्कर और पार्वतीजीको इस प्रकार प्रसन्न करके उनके सामने ही विमानपर सवार होकर वहाँसे चले गये। इससे उन लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २५ ॥ तब भगवान्‌ शङ्करने देवता, ऋषि, दैत्य, सिद्ध और पार्षदोंके सामने ही भगवती पार्वतीजीसे यह बात कही ॥ २६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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