बुधवार, 13 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीरुद्र उवाच - 

दृष्टवत्यसि सुश्रोणि हरेरद्‍भुतकर्मणः । 
माहात्म्यं भृत्यभृत्यानां निःस्पृहाणां महात्मनाम् ॥ २७ ॥
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति । 
स्वर्गापवर्गनरकेषु अपि तुल्यार्थदर्शिनः ॥ २८ ॥
देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वान् ईश्वरलीलया । 
सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापोऽनुग्रह एव च ॥ २९ ॥
अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि । 
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृतः ॥ ३० ॥

भगवान्‌ शङ्कर ने कहा—सुन्दरि ! दिव्यलीला-विहारी भगवान्‌ के नि:स्पृह और उदारहृदय दासानुदासों की महिमा तुमने अपनी आँखों देख ली ॥ २७ ॥ जो लोग भगवान्‌ के शरणागत होते हैं, वे किसी से भी नहीं डरते। क्योंकि उन्हें स्वर्ग, मोक्ष और नरकोंमें भी एक ही वस्तु के—केवल भगवान्‌ के ही समान भाव से दर्शन होते हैं ॥ २८ ॥ जीवों को भगवान्‌ की लीला से ही देहका संयोग होने के कारण सुख-दु:ख, जन्म-मरण और शाप-अनुग्रह आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं ॥ २९ ॥ जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दु:ख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ३० ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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