॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१३)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
कः क्षेमो निजपरयोः
कियान्वार्थः स्वपरद्रुहा धर्मेण ।
स्वद्रोहात्तव कोपः
परसम्पीडया च तथाधर्मः ॥ ४२ ॥
न व्यभिचरति तवेक्षा
यया ह्यभिहितो भागवतो धर्मः ।
स्थिरचरसत्त्वकदम्बेष्व
पृथग्धियो यमुपासते त्वार्याः ॥ ४३ ॥
सकाम धर्म अपना और दूसरेका भी अहित करनेवाला है। उससे अपना या पराया—किसी का कोई भी प्रयोजन और हित सिद्ध नहीं होता। प्रत्युत सकाम धर्मसे जब अनुष्ठान करनेवालेका चित्त दुखता है, तब आप रुष्ट होते हैं और जब दूसरेका चित्त दुखता है, तब वह धर्म नहीं रहता—अधर्म हो जाता है ॥ ४२ ॥ भगवन् ! आपने जिस दृष्टिसे भागवतधर्म का निरूपण किया है, वह कभी परमार्थसे विचलित नहीं होती। इसलिये जो संत पुरुष चर-अचर समस्त प्राणियोंमें समदृष्टि रखते हैं, वे ही उसका सेवन करते हैं ॥ ४३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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