॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
न हि भगवन्नघटितमिदं
त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः ।
यन्नाम सकृच्छ्रवणात्
पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
अथ भगवन् वयमधुना
त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः ।
सुरऋषिणा यदुदितं
तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥
भगवन् ! आपके दर्शनमात्र से ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्त: करण का सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है ॥ ४५ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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