गुरुवार, 7 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

न हि भगवन्नघटितमिदं 
     त्वद्दर्शनान् नृणामखिलपापक्षयः । 
यन्नाम सकृच्छ्रवणात् 
     पुल्कसकोऽपि विमुच्यते संसारात् ॥ ४४ ॥
अथ भगवन् वयमधुना 
     त्वदवलोकपरिमृष्टाशयमलाः । 
सुरऋषिणा यदुदितं 
     तावकेन कथमन्यथा भवति ॥ ४५ ॥

भगवन् ! आपके दर्शनमात्र से ही मनुष्योंके सारे पाप क्षीण हो जाते हैं, यह कोई असम्भव बात नहीं है; क्योंकि आपका नाम एक बार सुनने से ही नीच चाण्डाल भी संसार से मुक्त हो जाता है ॥ ४४ ॥ भगवन्! इस समय आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे अन्त: करण का सारा मल धुल गया है, सो ठीक ही है। क्योंकि आपके अनन्यप्रेमी भक्त देवर्षि नारदजी ने जो कुछ कहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है ॥ ४५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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